पड़िवा पहिलै पक्खड़ै, कर सूती सिणगार।

अजेस नायौ वल्लहौ, गोरंगी भरतार॥

बीज आज सहेलियां, बाळौ ऊगौ चंद।

दाड़िम जेहा दंतड़ा, सेज रम्यौ कंत॥

तीज आज सहेलियां, तीजड़ियां तिहवार।

गोरी सोहै आभरण, काजळ कुं कुमहार॥

चौथ चमक्कौ लाइऐ, दे चूना सुं चित्त।

आवैं धण रौ वालहौ, जोवै घर रौ वित्त॥

पांचम आज सहेलियां, पांचे बांध्या ठाण।

उकसीणा केकाण ज्युं, करै पलाण पलाण॥

छट्ठ छड़ा छड़ जोवता, पिउ पाटण परदेस।

चंपा जाण महक्किया, चंगा माढू देस॥

सातम दिन तौ वडलियौ, किम वउलेसी रैन।

नयणे नावै नींदड़ी, सालै घट में सैण॥

आठम हूवा आठ दिन, प्रीउ वीछड़ियां आज।

प्राण हुवै जो प्राहुंणौ, तो हिज राखै लाज॥

सखी सहेली सांभळौ, मैं मन काहल छाड़।

नव दिन कीधा नवरता, प्रीतम हंदी चाड॥

सखी सहेली साहिबौ, आइ मिलै भर बांथ।

जो पूजूं परमेसरी, दसराहौ पिउ साथ॥

सहियां आज इग्यारसी, म्हें तो आज व्रतीक।

करिस्यां तोही पारणौ, मिलसी वर तहतीक॥

बारस आज सहेलियां, ऊगा बारह भांण।

जाणूं साहिब आविया, तीन्हा तुरी पलांण॥

ते रस तेरह वही गया, अजे लाभै थाग।

माथै देहे हत्थड़ा, ऊभी जोऊं माग॥

चउदस खेलै चांदणी, सुखिया लोग सदीव।

म्हें तौ वाली आखड़ी, खेलेवा बिण पीव॥

पूनिम पूरा प्रेम सूं, घरे पधार्‌या राज।

मृगनयणी उच्छब करै, पिय कारण जसराज॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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