बिज्जुळियां नीळज्जियां, जळहर तूं ही लज्जि।

सूनी सेज, विदेस प्रिय, मधुरइ मधुरइ गज्जि॥

भावार्थ :- बिजलियाँ तो निर्लज्ज हैं। हे जलधर, तू ही लज्जित हो। मेरी शय्या सूनी है, मेरा प्यारा विदेश में है इसलिये तू मधुर-मधुर गरज।

स्रोत
  • पोथी : ढोला-मारू रा दूहा ,
  • सिरजक : कवि कल्लोल ,
  • संपादक : रामसिंह, सूर्यकरण, नरोत्तमदास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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