म्हारौ जलम 15 अप्रैल रै दिन जयपुर शहर में हुयौ। वठै री सरजमीं रै माथै ई म्हैं होस संभाळ्यौ। बठै गोडाळियां चालणौ सीख्यौ, अर बठै ई मां-पा-बा इत्याद सबद कैवणौ सीख्यौ। बठै ई पढ-लिख’र परवांन चढ्यौ। रथखांनै रै नजदीक हवाम्हैल रै सामनै री स्कूल में अंग्रेजी री मिडिल तक पढाई कीधी। उण पछै री पूरी-पूरी पढाई फारसी अर उरदू में संपूरण करी- ‘मुंशी फाजिल’ तक री। सौळाक बरसां री नैनी ऊमर में ईं शायरी करवा रौ शौक मन में जलम लियौ। म्हारा नानाजी जयपुर रा बौत नांमी शायर हा। वां रौ नांव हौ-फिदा हुसैन ‘फिदा’। वांरै साथै टाबरपणै में ई मुशायरां में जावणौ शुरू कर दियौ, सो कविता रौ रंग म्हारै मन पर दिनौ-दिन गहरौ चढियां गयौ। बीं बहाव में ईं अेक दिन म्हैं पैलौ शेर लिख्यौ, वीं छोटी सी ऊमर में ईं। शेर रा बोल हा—
कौन होता है शबै गम में किसी का हमनवां।
ये तो दुनियां है सितारों को हंसी आती रही।
नानाजी जद यौ मेरौ पैलौ शेर सुण्यौ, तौ सुण कर बौत खुस हुया, अर मेरी बौत तारीफ करी अर म्हारी पीठ पर हाथ मेल कर बोल्या—“स्याबास बेटा, अगर शौक हुवै तौ अब तूं बौत बढिया शायरी कर सकैगौ” बस वां रौ आसिरवाद मिलबा री देर ही, अब मेरौ मन खुलग्यौ हौ। अब म्हैं गजल कहण लाग्यौ अर बीं रै बाद में गीत कहणा भी शुरू कर दिया। हर वार जद म्हैं नई रचना लिखतौ तौ वांनै जाकर जरूर दिखावतौ कै कठै म्हैं रचना में फन सूं गिर्योड़ी बात तौ नीं कैयगौ हूं। कोई कमी वांनै महसूस होवती तौ वै इशारौ कर देवता, अर ठीक करवा देता, अर नीं तौ स्याबासी दे देवता। वै म्हनै नजम, गजल अर गीतां रै प्रकारां रौ भेद समझावता। ‘लय’ रौ गुण तौ मेरै में जलम जात ई हौ, जिंयां लता मंगेसकर में है। म्हारौ मांनणौ तौ कोई दुनियां जहांन में सिखाई सकै। खैर म्हैं रचनावां लिख तौ लेवतौ, पण वां रौ उपयोग...? उपयोग तौ कर नहीं सकतौ। ज्यां दिनां में मुशायरां में शायर नै पीसा कोनीं मिलता, शायरी बणावौ, पब्लिक नै सुणावौ अर ज्यादा सूं ज्यादा चाय पीय’र घरां आय जावौ। यौ ई तरीकौ चालतौ वां दिनां में। बौत ज्यादा ग्रुप सिस्टम भी हौ वां दिनां में। इण वास्तै जकौ ग्रुप मुशायरौ करातौ, वौ सिरफ आपरै ग्रुप रा लोगां नै ई इन्वाइट करतौ। जका बुलावता भी वै बदळै में ‘दाद’ देय’र विदा कर देवता, पण आपतौ जांणौ ई हौ सा के दाद सूं इंसान रौ पेट कोनीं भर सकै। आदमी रौ पेट तो रोटियां ईं भर सकै अर बीं रै वास्तै चायै दाम-दुकड़ी, अर मेरै ऊपर तौ बूढ़ी मां, भैणां अर भायां रौ भार हौ। बड़ी खस्ता हालत ही म्हारी, सो म्हनै जयपुर शहर छोडणौ पड़ियौ। म्हारौ मनभावतौ जयपुर, जावतां रौ हाथ कोनीं पकड़ै, पण आवतां रौ हाथ जरूर पकड़ै, सो म्हनै बड़ै दुखी मन सूं म्हारी मायड़ भोम छोड़’र बनवास आवणौ पड़्यौ, बंबोई शहर में। अरे हां, आपनै अचंभौ होवैलौ के म्हैं ठेट राजस्थांनी हूं। पीछै भी म्हारी जुबांन लखनवी या दिल्ली अंदाज री सुद्ध उरदू किंयां है?
इण रौ कारण हौ यौ के म्हारी हवेली जयपुर में च्यार दरवाजै रै बीचूं बीच है। फिरदौस-मंजिल बीं रौ नांव है। पूरौ पतौ है—च्यार हवेली, मोती कटरा, जयपुर। म्हारी हवेली रै च्यारूं मेर कायस्था री बस्ती है—माथुर, रस्तोगी, भार्गव इत्याद लोगां री, अर राजस्थांन रौ कायस्थ समाज जिसी खांटी उरदू रौ प्रयोग करै, बिसी उरदू तौ ऊंचै कुळ रा मुसलमांन भी कांम में कोनीं ले सकै। वां लोगां री सोहबत रै कारण ई म्हारी उरदू में मास्टरी होयगी, पण म्हैं मुश्किल उरदू रौ हिमायती कदैई कोनीं रह्यौ। आसांन बोलचाल री उरदू में ब्रज भासा रौ पुट देय’र म्हैं म्हारा गीता अर गजलां री रचना करी। राजस्थांन रै अलवर-भरतपुर इलाकां में ब्रज भासा ई बोली जावै, बीं रौ ठाट भी निराळौ है। म्हनै तौ ईं बात रौ गरब-गुमेज है कै म्हैं राजस्थान रौ हूं। आपणै राजस्थान रा कोई भी नामी-गिरामी गीतकार-शायर आपरै नाम रै साथै राजस्थान नै नीं जोड़ियौ, पण म्हैं मरूंगा तद तांईं हसरत जयपुरी ई रैवूंगा।”
हसरत जयपुरी, फिलमी दुनियां रै गीतां रौ अनोखौ गीतकार है, जिण रै नांव रौ डंकौ गैलड़ा दिनां तांईं भारत भर में ईं नीं, आखी दुनियां भर में बाजतौ रह्यौ। आज ई हसरत रै गीतां री मधुर गूंज रेडियौ रै अमर गीतां री लड़ियां मांय हर पल गूंजती रैवै। भारत रै दिग्गज सूं दिग्गज, संगीतकारां, निर्मातावां रै साथै कांम करणियौ हसरत स्व. जयकिसन अर शैलेन्द्र रै गुजर जावण रै बाद इण मायावी दुनियां सूं थोड़ौ अळगौ पड़गौ अर स्वारथ सूं भरी इण फिलमी दुनियां री अणजांरा अळियां-गळियां अर बियाबानां में बैठौ है चुपचाप। फिलमां में कांम बौ आज भी करै, पण बौ स्थांन अर मुकांम अब कोनीं रह्यौ। कहावत ई है के ‘ज्यांरा मरगा बादस्या, रुळता फिरै वजीर।’ सैकड़ूं श्रेष्ठ पुरस्कार लेवणियौ हसरत ग्रुपबाजी रै उळझाव भरियोड़ौ व्यूह जाळ में फंसग्यौ। हसरत आपरी कथा चालू राखै—
“म्हैं आज भी बौत खुस हूं। बौत ई आरांम में। कोई बात री कमी कोनीं। हसरत री सब हसरतां पूरी होगी। मेरी मां ई पसंद करकै कानपुर में मेरौ ब्याह कर्यौ। तीन टाबर है। तीनूं पढ़ाई-लिखाई में लागर्या है। पढाई-लिखाई करकै नौकरी पर लाग ज्यावैगा। बैनां रा ब्याव कर ई दिया, अेक रौ अेडन मांय, दूजी रौ बंबोई में ईं संगीतकार सरदार मलिक रै सागै। आपणा सगळा ई फरज अदा हूयग्या, अब बस बेटी रौ ब्याह करणौ बाकी है। बीं री पढाई पूरी होय जावै, तौ बीं फरज सूं भी मुक्ति मिलै। बीयां तौ कोई कुछ भी बोलै, पण म्हैं ईं मायावी दुनियां में पच्चीस बरस गाळकर भी आज तांईं राजस्थानी तहजीब सूं ई खुदरौ जीवन यापन कर्यौ हूं। फिलमां में गीत लिखूं। मेरी शायरी रौ अेक संकलन आय र्यौ है।”
मेरी अेक होटल है, फ्लैट है, किरायौ आवै है, आपांनै और कांईं चायै। जद-जद राजस्थांन जाऊं, मन भींज ज्यावै, नेह सूं, प्यार सूं, भावना सूं। इण माया नगरी में पच्चीस बरस गाळकर भी म्हैं जरा भी कोनीं बदळ्यौ। म्हारै घर री लड़कियां आज ई मॉडर्न ड्रेसां कोनी पैर सकै। जीन्स वगैरा रौ उपयोग कोनीं कर सकै। लाजहया रौ पूरौ-पूरौ खयाल राखणौ पड़ै। लड़कां री स्कूलं में उण रै साथै लड़कियां री पढाई रै म्हैं सख्त खिलाफ हूं। कांईं करूं म्हारी परम्परा नै भी कोनीं छोड़ सकूं, बिसराय सकूं। लोग म्हनै कैवै भी है के पुरांणै खयालां रौ दकियानूसी आदमी है। अब म्हैं जो भी हूं, बात आ है के म्हैं म्हारै पुरखां रै आचार-व्यवहार नै कोनीं बिसराय सकूं। भगवांन में म्हारी बौत ज्यादा आस्था है, जकी भावनावां सूं मिंदरा में जाऊं, वां ईं विचारां सूं दरगाह में जाऊं। आज भी म्हैं अठै बंबोई में रैवता थकां ईं आ महसूस करूं के म्हैं बंबोई रौ वासी कोनीं, ठेट राजस्थांन रौ हूं। अठै तौ बनवासी रै रूप में बनवास भोगूं हूं। कारण अठै कांम है, दांम है, नांम है, बठै सिरफ मां री गोदी है। बेटै नै भूख भी तौ लागै जद बीं नै मन मार’र बीं गोदी सूं दूर जावणौ ई पड़ै। ईं खातर ई म्हैं अठै कमावण नै आयौ हौ। बंबोई में पूग’र बस कण्डक्टरी री नौकरी करी, बरसां तक अठै रा फुटपाथां पर, चौपाटी रा मैदांन मांय दीतवार नै बंद दुकानां रै बारणै बैठ’र जैपर रा कुट्टी रा खिलूणा बेच्या। रात नै मुशायरां में जावतौ। अर अेक दिन मुशायरा रै कारण सूं ईं फिलमां रा दरवाजा खुलग्या। राजकपूर जैड़ा पारखी गुणी निरमाता, शंकर-जयकिशन जैड़ा संगीतकार अर शैलेन्द्र सरीखा गुणी साथी मिलग्या। म्हारी पैली ई फिलम, अर फिलम रा सगळा गीत हिट हुया। पैला-पैला गीत लिख्या ‘बरसात’ खातर- ‘जिया बेकरार है, छाई बहार है,’ हवा में उड़ता जाये मेरा लाल डुपट्टा मलमल का’ ‘अब मेरा कौन सहारा’। बस बीं रै बाद तौ लगोलग मेरी फिलमां हिट होती गई अर म्हैं चोटी रौ गीतकार बणग्यौ।”
आप आपरै गीतां मांय राजस्थांनी घुनां या राजस्थांन रै लोक संगीत रौ कदै ई उपयोग कर्यौ?
बिल्कुल कर्यौ, पण कदै ई भी कोई गीत या धुन री डिट्टौ कारबन कॉपी कोनीं उतारी। नकल कोनी करी। म्हारौ संगम में लिख्यौ गीत—‘मैं क्या करूं राम, मुझे बुड्ढ़ा मिल गया’ में फोक रा ई तौ भाव है, पण गीत नै चोर’र है जीयां रौ जीयां रख देवण रौ कांम म्हैं कदै ई कोनीं कर्यौ। अब जीयां उदाहरण दूं तौ ‘पल्लौ लटकै गोरी रौ पल्लौ लटकै’ जैड़ै शुद्ध लोकगीत री फिलम ‘नौकर’ में जकी दुरगत हुई वा कुण कोनी जांणै। इणीं तरह ‘झूंठ बोले कव्वा काटे’ जकौ विट्ठल भाई पटेल ‘बॉबी’ मांय लिख्यौ, वौ ई राजस्थांनी लोकगीत रौ बिगाड़ियोड़ौ रूप है। 'कागला ई कदै ई काटै?' कागला भींट लेवै तौ राजस्थांन में लोगां नै न्हावणौ पड़ै, गंगाजळ छिड़कणौ पड़ै। ईं रा राजस्थांनी बोल है—‘झूंठ बोलै किरिया (काळी कीड़ी) काटै।'
म्हारा सुप्रसिद्ध रसवंता गीत ‘मुरली बैरन भई रे कन्हैया, तेरी मुरली बैरन भई, बावरी मैं बन गई’ ‘सजन संग काहे नेहा लगाया,’ ‘जो तुम तोड़ो पिया, मैं नाहीं तोडूं रै’ जैड़ा शास्त्रीय ठाठ रा अमर गीता री सबदावळी म्हैं राजस्थांनी फोक स्टाइल पर ई लिखी ही। नहीं तौ अठै तौ ‘ठाडे रहियो ओ बांके यार’ जैड़ी रचनावां लिखी जावै अर वां नै राजस्थांनी फोक रौ नांव दियौ जावै। ईं रौ शुद्ध रूप है— ‘ठाडे रहियो कदम की छैंयां मैं गगरी धर धर आऊं।’ आज ई राजस्थांन री हजारूं धुनां म्हारै जहन में है। राजस्थांन री मांड, लूर, लहरिया, सांवण रा हींडा, सांवण रा मन भावंता गीत, अर दरबारी ठाठ री चीजां तौ अणमोल है। आपां रै राजस्थांन री तो अेक- अेक ढोलण इस्या इस्या गीत गाय देवै के चोखा-चोखा ऊंचै दरजै री गायकी रौ दम भरण आळा खां साव ई दांतां हेटै आंगळी दाव लेवै। वांरै लहजै, लज्जत अर गायकी रौ मुकाबलौ कोई कोनीं कर सकै। ईं रौ कारण है औ के आपां रै अठै पुरांणा जमानां सूं ई रीत चालती आई है के उत्तम कळावतां नै राज्याश्रय मिलतौ आयौ है। रजवाड़ां रै बगत में बडै-बडै उस्तादां नै सिरोपाव, जागोर, वगैरा देय’र राखता। वां री गायकियां रौ सम्मांन कियौ जावतौ। म्हांरै माधौ सिंघजी अर मांनसिंघजी सैकडूं गावण आळा नै आसरौ दे राख्यौ हौ। बडा-बडा खां साव नौकरी पर राख्या जाता। इस्यै रंगरूड़ै राजस्थांन में अगर गीत-संगीत री गंगा नहीं बहसी, तौ कांईं ऊसर में बहसीं। अर साब अेक कहावत है—‘यथा राजा तथा प्रजा।' जद राजा ई इस्या गुण पारखी होवता, संगीत रा बेजोड़ प्रेमी होवता, तौ पछै वांरी प्रजा ई क्यूं लारै रैवती। थांरै-म्हारै राजस्थांन में तौ कण-कण मांय ध्वनि ऊभरै, पेंड-पेंड पर देवता बिराजै, हर दिन त्यूंहार हुवै, हर त्यूंहारां रा, संबंधां रा, ब्याव रा, जळवा रा, हर चीज रा गीत होवै, बठै सांची कैवूं के कण-कण गीत अर संगीत सूं भरियोड़ौ है। अर म्हनै गरव-गुमांन है के म्हैं राजस्थांन रौ हूं।”
हसरत जयपुरी आपरी खास फिलमां में ‘बरसात’, ‘आवारा’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘संगम’, ‘परवरिश’, ‘गीत गाया पत्थरों ने’, ‘सेहरा’, ‘तेरे घर के सामने’, ‘दिल एक मंदिर’, ‘झनक झनक पायल बाजै’, ‘सूरज’, ‘आ मिलन की बेला’, ‘जंगली’, ‘जानवर’, ‘बदतमीज’, ‘कॉलेज गर्ल’, कन्यादान, अर गबन इत्याद रा नांव लेवै, जकी कामयाब ई हुई अर हसरत नै लोकप्रियता ई दी।
(प्रस्तुति : कुंदन किशोर)