आ बात म्हनै घणी संजीदा अर अरथाऊ लागी के ‘अपरंच’ रौ अेक आवगौ अंक आठवैं दसक री राजस्थानी कविता– खासकर सन् 1971 में प्रकासित ‘राजस्थानी-अेक’ री कवितावां, उणरी भूमिका अर असर माथै केंद्रित राख पूरसल विचार करीजै। निस्चै ई औ विचार म्हनै राजस्थानी नुंवी कविता रै विगसाव, उणरी सुर-संवेदना, बुणगट अर सगत-सींवां नैं समझण लेखै घणो महताऊ अर जरूरी लागै। खुद म्हारौ औ निजू अणभव रह्यौ कै लारला चाळीस बरसां में जद-कद ई राजस्थानी कविता माथै कोई चररचा हुई कै किणी लेखक-आलोचक इण माथै विचार करण रौ मन बणायौ, ‘राजस्थानी-अेक’ अर उण दौर री कविता खासतौर सूं चरचा में आवती रही, पण इण हवालै री पूठ, छप्योड़ै पाठ रै सरूप अर उणरै असर माथै सांवठी चरचा कमती ई भाळै पड़ी।
इणी समचै जद ‘अपरंच’ रा संपादक म्हारै जिम्मै औ काम सूंप्यौ के उण इतियासू हवालै अर आठवैं दसक री राजस्थानी कविता माथै म्हैं अेक सांवठी टीप लिखनै भेजूं, जिणमें इण हवालै सूं जुड़ियोड़ा सगळा पखां –पहलुवां माथै नेठाव सूं विचार कियो जावै, जिका साहित्य-विवेचन री दीठ सूं भलां उत्ता जरूरी नीं लागै, पण वांरौ राजस्थानी कविता अर साहित्य रै विगसाव माथै गैरो असर मानीजै। म्हनै वांरौ औ विचार निस्चै ई अरथाऊ लाग्यौ।
इण दीठ सूं विचार करतां अठै पैली बात उण इतियासू हवालै, उणमें प्रस्तावित कविता री सुर-संवेदणा अर उण चौफेर नै समझ लेवणौ घणौ वाजिब व्हैला, जिणसूं इण नुंवी कविता रौ सुभाव, सरूप अर विगसाव जुड़ियोड़ौ जाणीजै। ज्यूंके पैली तथ्य री बात आ रही के सन् 1970 में कवि तेजसिंह जोधा आपरी अेम. अे.री भणाई रै दरम्यान जयपुर सूं राजस्थानी री नुंवी कविता नै ठावी ओळख दिरावण मतै कीं टाळवां कवियां री कवितावां नै अेक सीरीज में छपावण री योजना बणाई अर इण माथै चरचा करी तौ म्हनै ई वांरी बात कीं अरथाऊ लागी। इण योजना में अेक सहयोगी रै बतौर म्हैं हरमेस वांरै साथै रह्यौ। तेजसिंह जोधा वां दिनां राजस्थानी री अेक लांबी कविता ‘कठैई कीं व्हेगौ है’ लिखण में लाग्योड़ा हा। आ कविता केई किस्तां में लिखीजी अर करीबी लोगां रै बिच्चै वां उछाव सूं उणरौ केई दफै पाठ ई कियौ। वां जठै साहित्य संगोस्ठियां में इण कविता नै सुणाई, वांनै आछौ रिस्पोंस मिळियौ। निस्चै ई उणसूं वांरौ राजस्थानी कविता में आतमविस्वास प्रबळ व्हियौ। इणी योजना समचै वां राजस्थानी रा पांच सक्रिय कवियां नै टाळया, जिका नुंवै भावबोध अर आपरै निरवाळै सिल्प रै पाण इण योजना रै अनुकूल लाग्या। अै कवि हा—गोरधसिंह शेखावत, पारस अरोड़ा, ओंकार पारीक, मणि मधुकर अर खुद कवि-संपादक तेजसिंह जोधा। नतीजन सन् 1971 रै सरुआती दिनां में इण सीरीज री पैली कड़ी ‘राजस्थानी–अेक’ छापै सरूप सांमी आयगी। संकलण में आं पांच कवियां री कवितावां अर वांरै आतम-बयान रै साथै आपरी लांबी संपादकीय में तेजसिंह जोधा आजादी पछै री राजस्थानी कविता अर मंच री कविता बाबत जिण भांत नकार रौ सुर अपणायौ उणनै लेय लारली पीढी रा कवियां-लेखकां अर उण बगत री राजस्थानी पत्रिकावां में कीं अणचींती प्रतिक्रिया ई हुई। केई नुंवा लोगां नै संपादक री बातां सुहावती लागी तौ केई बूढा-बडेरां वांरी राय सूं अेकमत नीं व्हेतां थकां ई अंक री कवितावां अर संपादक रै गद्य री तारीफ करी। 'राजस्थानी–अेक' माथै आई प्रतिक्रियावां सूं आगै चाल तेजसिंह जोधा जद सन् 1973 में चौपासनी शोध संस्थान री पत्रिका ‘परंपरा’ रौ अेक खास अंक ‘हेमांणी’ आधुनिक राजस्थानी कविता माथै केंद्रित करनै संपादित करण रौ जिम्मौ लियौ, तौ वांनै आपरी सोच माथै पाछौ विचार करणौ जरूरी लाग्यौ। ता-पछै ‘जागती जोत’ में छप्यै आपरै आतम-बयान में ई वां खुद राजस्थानी-अेक री संपादकीय रै इण नकार भाव नै कबूल करतां कह्यौ के “उण टीप में नुंवी कविता सूं पैली री सगळी कविता रै बाबत अेक गैरो नकार भाव हौ।''
(जागती जोत, जून 1996, खुद सूं खुद री बातं, पृ.19) जदके आ बात सगळा जाणै के साहित्य में नकार रौ भाव राखणौ कोई गुण नीं मानीजै।
राजस्थानी-अेक रै प्रकासण अर उणरी भूमिका माथै विचार करतां आ बात पण चेतै राखणी वाजिब व्हैला कै उण बगत राजस्थानी में निकळण वाळी पत्रिकावां में राजस्थानी रा अै ई नुवां-जूना कवि बरोबर छपता रह्या, खुद पारस अरोड़ा अर हरमन चौहान ‘जाणकारी’ पत्रीका रै जरियै नुंवी कविता नै ओपतौ मंच दियौ। कवि सत्यप्रकाश जोशी, नारायणसिंह भाटी अर कन्हैयालाल सेठिया सरीखा चावा कवियां री नुंवै भावबोध अर नुंवै रचना-सिल्प में ढळियोड़ी कवितावां रा संग्रै तकात छपनै सांमी आय चुक्या हा। अठै तांई के आठवैं दसक रा सरुआती बरसां में खुद नुंवा कवियां में पारस अरोड़ा री ‘छळ’, गोरधसिंह शेखावत री ‘किरकर’, ओंकार पारीक री ‘मोरपांख’, आं ओळियां रै लेखक री ‘अंधार-पख’ अर कीं दिनां पछै चंद्रप्रकाश देवल री ‘पागी’ सरीखी चावी काव्य-कृतियां प्रकासित व्है चुकी ही, जिकी के इणी दौर री कविता री आमद गिणीजै। म्हैं इणी कड़ी में ‘राजस्थानी-अेक’ रै प्रकासण नै अेक महताऊ घटना अवस मानूं, पण उणसूं इज नुंवी कविता री सरुआत हुई व्है, के औई पैलो प्रतिनिधि संकलण सांमी आयौ व्है, आ बात हकीकत सूं मेळ नीं खावै, साथै ई आ पण कैवणी जरूरी लागै के ‘राजस्थानी-अेक’ इण कड़ी में अेक आछौ संजोग बण नुंवां कवियां री हूंस बधाई। यूं इण योजना रै लारै कीं दूजा कारण पण रह्या, जिकां में अेक कारण तौ खुद संपादक तेजसिंह जोधा ई गिणायौ के “हिंदी में निसर्योड़ा तीन सप्तक उण विचार री प्रेरणा हा।”
(जागती जोत, जून 1996, पृ. 18)
इणी भांत दूजौ कारण रह्यौ खुद संपादक तेजसिंह जोधा री लांबी राजस्थानी कविता ‘कठैई कीं व्हैगो है’ रै प्रकासण री जरूरत, जिणनै अेकठ रूप में छापण जोगी कोई पत्रिका वां दिनां राजस्थानी में नीं दीखती, जदके इण कविता माथै वांनै जयपुर री साहित्यिक गोस्ठियां में आछौ रिस्पोंस मिळ्यौ। इण कविता नै ओपतौ मंच देवण सारू जरूरी हौ के कोई इण भांत री साहित्यिक पत्रिका आगूंच त्यार व्हेती, ज्यूं वांरी उत्ती ई लांबी दूजी कविता ‘म्हारा बाप’ नै हिंदी री ‘लहर’ सरीखी पत्रिका मूळ राजस्थानी अर उणरै हिन्दी उल्थै रै साथै छापण रौ जिम्मौ संभाळ लियौ, के ‘दीठाव रै बेजां मांय’ हिंदी री प्रतिष्ठित पत्रिका ‘आलोचना’ में मूळ रूप में छपगी। तेजसिंह जोधा अर म्हारी इंछा तौ अवस रही के आ सीरीज आगै कायम रैवै, पण साधनां री कमी अर अेक जिग्यां पग-टिकाव नीं व्हेण रै कारण राजस्थानी रौ औ पैलौ अंक ई सेवट इणरौ छेहलौ अंक बणग्यौ। राजस्थानी नुंवी कविता नै ठावी ओळख दिरावण में निस्चै ई आ योजना कारगर रही अर आवता दिनां री चरचा में इण अंक रौ इतियासू महत्व मतै ई बणतौ रह्यौ। अठै इण बात नै ई अणदीठी नीं करणी चाईजै कै राजस्थानी री नुंवी कविता रै सीगै केई दूजा कवी पण उत्ती ई ताब अर नुंवै तेवर साथै सांमी आवै हा, जिकां में कृष्ण गोपाल शर्मा, रामस्वरूप परेश, सांवर दइया, चंद्रप्रकाश देवल, प्रेमजी प्रेम, मोहन आलोक, पुरुषोत्तम छंगाणी, शिवराज छंगाणी, रामेश्वर दयाल श्रीमाळी, अर्जुनदेव चारण, मोहम्मद सद्दीक, कमला वर्मा, जुगल परिहार सरीखा केई युवा कवि आवता दो-तीन बरसां में ई नुंवा कवियां बिच्चै आपरी आछी ओळख बणाय लीवी।
कविता रै रचाव अर उणरै विगसाव री आपरी न्यारी प्रक्रिया अर अेक अदीठ आफळ व्है, जिकी किणी बारली मांग के अणचींतै दबाव सूं कीं उगणीस-इक्कीस भलां व्है जावै, उणरै आंगै आवतै बदळाव के आपै ढळती ऊरजा में घणौ अंतोळौ नीं आवै। बगत अर हालात समचै जिकौ बदळाव के आपै ढळती ऊरजा में घणौ अंतोळौ नीं आवै। बगत अर हालात समचै जिकौ बदळाव सुभाविक व्है, वौ तौ आयां ई सरै। वौ आपरी जरूत परवाण आवै अर जद तांई सांवठी समूह-चेतना अर वांरै कारज-सभाव रौ अंग नीं बण जावै, उणनै अंगेजण री ऊरमा पण भाळै नीं पड़ै। राजस्थानी भासा अर उणरी अतूट काव्य-परंपरा सूं विगसती जुगादी नुंवी कविता रै रचाव अर उणरी अंतर-जातरा नै म्हैं इणी प्रक्रिया सूं जोड़नै देखतौ रह्यौ हूं। इण काव्य-परंपरा सूं खुद म्हारौ बगत री कविता रौ मिजाज अर उणरौ रचाव लारली काव्य-परंपरा सूं किण भांत न्यारौ अर नुंवादौ कथीजै।
‘राजस्थानी-अेक’ रै प्रकासण अर उण माथै सरू व्ही चरचा सूं उम्मीद तौ सगळा नै आ ई बंधी के इणसूं जुड़ण वाळा कवि राजस्थानी कविता नै किणी नुंवै मुकाम तांई पुगावैला, के खुद आपरै गाढै सिरजण सूं राजस्थानी कविता में नुंवी साख बणावैला, पण उम्मीद री तौ उडीक ई बण्योड़ी रैयगी। हिंदी री नुंवी कविता रा वाजिंदा कवि मधुकर ‘राजस्थानी-अेक’ में छपी कीं कवितावां साथै आपरी हिंदी कवितावां रौ राजस्थानी उल्थौ त्यार कर रातूंरात बोरूंदा री मदद सूं अेक संग्रै छपवायौ ‘पगफेरौ’ अर उण माथै केंद्रीय साहित्य अकादमी रौ पुरस्कार घोसित करवाय राजस्थानी में कविता लिखण री आपरी मजूरी हस्तै करवाय लीवी अर पाछौ पगफेरौ करण री जरूत वांनै नीं लखाई। वै कठीनै हार-मोर व्हिया, इण बात री खबर वांरै असमय अंतकाळ तांई किणी नै नीं लागी। ओंकार पारीक राजस्थान साहित्य अकादमी में ई सचिव पद सूं छेहड़ौ लियां पछै, ओंकार श्री नांव सूं कीं अरसै राजस्थानी अकादमी में ई सचिव रै पद माथै काम कियौ, पण ‘राजस्थानी-अेक’ री नैनी-नैनी कवितावां पछै जिण भांत मून धारण कियौ, पाछा राजस्थानी कविता रै ताल में कमती ई निजर आया। खुद अंक रा संपादक तेजसिंह जोधा आपरी तीजी कविता ‘दीठाव रै बेजां मांय’ रै प्रकासण पछै जिण भांत काव्य-सिरजणां सूं पूठ फोर उदासीन व्हिया, वां साथियां रै घणी वार बकारियां पछै ई पाछल नीं फोरी। बाकी बच्या पारस अरोड़ा अर गोरधसिंह शेखावत, अर अै दोनूं कवि आपरै ढंग सूं कमोबेस सक्रिय रह्या। आं दोनां री तुलना में गोरधनजी जरूर कीं मैळा पड़ता दीख्या, कुण जाणै लक्ष्मणगढ़ जैड़ी छोटी जिग्या रै अेकेलपै रै कारण अर कीं आपरै सुभाव-सरोकार री सींवां रै कारण, इण बात रौ खुलासौ कदैई नीं व्हियौ। म्हनै अेक बात आ पण लागै के वांरै नजीक कविता या साहित्य किणी संवेदू मकसद नै साधण रौ सिरजण-आधार कमती रही अर सन् 1987 में कवितावां रौ अेक संग्रै ‘पनजी मारू’ नांव सूं जरूर आयौ, पण ता-पछै वै आपरी कॉलेज री नौकरी में इत्ता मगन व्हेग्या के अेक सक्रिय कवि रै रूप में वांरी मौजूदगी कमती ई निजर आयी।
‘राजस्थानी-अेक’ रा आं पांचूं कवियां में पारस अरोड़ा इण लेखै सगळां सूं न्यारी काट रा कवि रह्या, जिकां री कविता रा संग्रै ई बगत-बगत माथै बरोबर आवता रह्या अर वां खुद आपरै बूतै ‘अपरंच’ सरीखी तिमाही पत्रिका रै जरियै राजस्थानी नुंवी कविता नै अेक ठोस आधारभोम अर नुंवा कवियां सारू ओपतौ मंच दियौ। खुद छापैखानै में काम करतां, वां आपरी मैणत-मजूरी अर राजस्थानी रा लेखकां-पाठकां री हूंस समचै दो बरस तांई लगूलग इणी ‘अपरंच’ पत्रिका रा आठ अंक निकाळ्या, जिकी आज तीन दईकां पछै पाछी चेतन व्हैगी है। असल में वांरी मूळ चिंता फगत आपरी मातृभासा में कविता लिखणौ कदैई नीं रही अर नीं औ ई मकसद के वै आपरै हलकै रा आगीवाण कवि मानीजै। असल में कविता वांरा समाजू सरोकारां अर देस-दुनिया रा अबखा हालात माथै, आपरी गाढी चिंता रा दरसावण अर अेक समाजवादी लोकचेतणा री अलख में आपरौ सुर मिळायां राखण री मांयली बळत रौ नतीजौ ही, जिकी कदेई ‘झळ’, कदेई ‘जुड़ाव’, तौ कदेई ‘काळजै में कलम लागी आग री’ सरीखा संग्रहां री मारफत अगोलग सांमी आवती रही, पण राजस्थानी रा साहित्य-बजार में आपरो माल खपावणिया अर आपरी गोटियां सिरकावणिया अकादमीबाज संयोजकां नै हरीश भादाणी, पारस अरोड़ा, मोहम्मद सद्दीक सरीखा जनचेतना रा ठावा कवि कदेई अकादमी-सम्मान री प्रक्रिया में चेतै नीं आया।
इणी समचै जद राजस्थानी कविता में आवतै बदळाव री पड़ताल करां तौ आ बात साफ निगै आवै के सातवैं दसक तांई आवतां मुलक रा सामाजिक-आरथिक हालात खासा बदळग्या हा। गांवां में पंचायतीरारज कायम व्हेग्यौ। लोकतंत्र नै लेय कीं मौळी-माठी जाग्रती ई आई। आम जनमा में राज बाबत वापरियोड़ी उदासीनता कीं कमती व्ही। सड़क अर रेल यातायात में बधोतरी व्ही। कस्बां में बिजळी पूगी, अखबार रेडियो अर संचार-प्रसार रा साधन पूग्या। मुलक अर दुनिया सूं लोगां री पिछाण बधी, गांव-गळी, आड़ोस-पाड़ोस अर मुलक री मोटी अबखायां नै लेय लोग सवाल उठावण लाग्या। गिणती री सुविधावां रै साथै सार्वजनिक जीवण में अबखायां बधी, आम जरूत री चीजां मूंघी व्हेतो रही, बेरोजगारी दिन-दूणी बधी, भ्रस्टाचार अर बेईमानी समाज री नींवां तांई जाय पूगी। इणी समचै वोट री राजनीत करणवाळां अणफैम में ई केई बातां लोगां नै समझाय दीवी, जिणरौ कुल नचीजौ औ व्हियौ के मुलक रा माली हालात नै लेय लोगां री बधती चिंतावां अेक हद पूग्यां पछै असंतोख में तब्दील व्हेण लागी। इणी असंतोख रै कारण भणिया-गुणिया अर हालात सूं पीड़ित लोगां में रोस भरीज्यौ! औ असंतोख अर रोस ई जीवण रा तमाम दूज छेत्रां में आपरै ढंग सूं सांमी आवण लाग्यौ। आं ई लोगां में कीं संवेदणसील कवि हा, जिकां रै सिरजण में हालात अर अबखायां मुखर व्ही। साहित्य रा पाठकां री मनगत ई बदळण लागी अर वां मांय सूं जिका नुंवा रचनाकार सांमी आया वांरी संवेदणा में औ गाढौ असंतोख अेक तीखी प्रतिक्रिया रै रूप में परगट व्हियौ– पारस अरोड़ा, गोरधनसिंह शेखावत, हरीश भादाणी, मोहम्मद सद्दीक, मोहन आलोक, चन्द्रप्रकाश देवल, सांवर दइया, अर्जुनदेव चारण, मालचंद तिवाड़ी, भगवतीलाल व्यास सरीखा मौजीज कवियां में खासकर ज्योतिपुंज, उपेन्द्र अणु, अम्बिकादत्त, आईदानसिंह भाटी, ओम पुरोहित कागद, मीठेश निरमोही अर कीं नुंवा-नकोर कवियां में अतुल कनक, सुमन बिस्सा, भविष्यदत्त भविष्य, नीरज दइया, संतोष मायामोहन, मदन गोपाल लढ़ा इत्याद री कवितावां पण इणी सुर-संवेदणा री साख भरै। आं दो पीढी रा कवियां री आ अेकठ जातरा हाल आपरी गति सूं जारी है।
संतोख री बात आ ई जाणीजै के आधुनिक राजस्थानी कविता रै इण जीवंत सरूप अर उणरै विगसाव में आज जिकी कविता आपरी साख कायम राखी, उणमें जनकवी उस्ताद री परंपरा नै आगै बधावण वाळा कवियों में आज अै ई कवी सिरै गिणीजै अर आ ई कविता राजस्थानी रौ आगोतर संवारती निगै आवै।