तत् वाद्य की श्रेणी में आने वाला यह वाद्य यंत्र वीणा का प्रारंभिक रूप कहा जाता है। इसकी आकृति वीणा जैसी ही होती है। इस वाद्य में दो तुंबे होते हैं। इसकी डांड बाँस की बनी होती है, जिस पर पशु की खाल से बने बाईस परदे मोम से चिपकाए जाते हैं। परदों के ऊपर पाँच या छह तार लगे होते हैं।
इसका वादन खड़े होकर इसे गले में लटकाकर किया जाता है। इसका मुख्य रूप से प्रयोग देवनारायण जी की कथा कहने वाले गूजर भोपे करते हैं। बगडावत देवनारायण जी की फड़ वाचन के समय जंतर वाद्य को बजाते हुए गूजर भोपे इनकी कथा कहते हैं और गीत गाते हैं।
नागौर, भीलवाड़ा और अजमेर इस वाद्य के केंद्र हैं। सवाई भोज और मेवाड़ के भोपे इसके वादन में अत्यंत कुशल होते हैं।