वाद्ययंत्र पर लेख
वाद्ययंत्र भारत संसार
की सबसे समृद्ध परंपरा, संस्कृति और संगीत का उत्तराधिकारी है। यहाँ के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में भी संगीत का उल्लेख है। यहाँ के देवी-देवताओं के चित्रों की कल्पना में भी संगीत पक्ष को अनदेखा नहीं किया गया है। प्रत्येक देवी-देवता के लिए किसी न किसी वाद्य-यंत्र बजाने में निष्णात होने की कल्पना की गई है। शिव का डमरू-वादन, कृष्ण का बाँसुरी-वादन और सरस्वती का वीणा-वादन यहाँ की परंपरा में विख्यात है। सांगीतिक ध्वनियों का संबंध वाद्ययंत्रों से है जिसे अंग्रेज़ी में ओर्गेनोलोजी कहते हैं। संगीत की इसी परंपरा को आगे भी समृद्धि मिलती गई और आज भारत सांगीतिक समृद्धि के लिए संसार में जाना जाता है। तबला, सितार, संतूर, सारंगी और बाँसुरी जैसे वाद्ययंत्रों के वादन में भारत का दुनिया में कोई सानी नहीं है। दूसरी शताब्दी के आचार्य भरत ने अपने ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ में संगीत के वाद्ययंत्रों का बनावट के आधार पर विभाजन करते हुए चार विभाग क्रमशः तत् वाद्य, सुषिर वाद्य, घन वाद्य और अवनद्ध वाद्य निर्धारित किए हैं। राजस्थान के सन्दर्भ में इन चारों प्रकार के वाद्य यंत्रों पर बात की जा सकती है। परंपरागत वाद्य यंत्रों के अलावा यहाँ स्थानीय वाद्ययंत्र भी निर्मित किए गए हैं, जो इस बात का साक्ष्य है कि इस सूखे प्रदेश में संगीत का झरना कभी सूखा नहीं था। यहाँ तबला, ढोलक, सारंगी, संतूर, वीणा, बाँसुरी, सितार, मृदंग जैसे परंपरागत वाद्यों के अलावा कामायचा, खड़ताल, और मोरचंग जैसे नए वाद्ययंत्रों का भी निर्माण और विकास हुआ। सारंगी के ही एक दूसरे प्रकार सिंधी सारंगी के लिए राजस्थान के कलाकार श्री लाखा खान मांगणियार भारत के सर्वोच्च नागरिकता पुरस्कारों में से एक ‘पद्मश्री’ से सम्मानित हो चुके हैं।