जलाल और बूबना की प्रेमकथा राजस्थान में सुप्रसिद्ध है। इसी प्रकार यहाँ जलाल के सम्बंध में कई लोकगीत भी गाए जाते हैं, जिनमें से अनेक प्रकाशित हो चुके हैं। फिर भी कई गीत अभी अप्रकाशित ही हैं। यहां ऐसे दो लोकगीत प्रस्तुत किए जाते हैं।
जलाल और बूबना के सम्बंध में कुछ विशिष्ट बातें ध्यान में रखने योग्य हैं, जो इस प्रकार है:-
(1) राजस्थान में जलाल जैसे प्रेमी के पीछे ‘जला’ शब्द ही ‘प्रेमी’ का पर्यायवाची बन गया।
(2) जला का मामा ‘मृग तमायची’ ऐतिहासिक व्यक्ति है। कई हस्त लिखित ग्रंथों में इसका जिक्र आता है।
(3) ‘मृग तमायची’ भाटियों का भांजा था। बूकन भाटी मामा का बेटा था। मृग तमायची के यहाँ वह प्रधान के पद पर काम किया करता था। उसकी एक बेटी ‘कस्मीरदे’ की शादी जोइया मुसलमान देपालदे के साथ हुई थी। दूसरी बेटी का नारियल मारवाड़ राज्य के संस्थापक चूंडाजी के पिता वीरमदे को भेजा गया था। वीरमदे और देपालदे के वैमनस्य के कारण वीरमदे ने विवाह के लिए जाकर भाटियों से झगड़ा किया था।
(4) मृग तमायची की राजधानी ‘थट्टा भखर’ सिध में है। उस समय यह संस्कृति का केन्द्र था। यहां के विशाल क़िले के खंडहर का चित्र पाकिस्तान के पांच रुपये के नोट पर चित्रित है।
जलाल के सम्बंध में ‘डेरा निरखण आई रे जला’ लोकगीत राजस्थान में अत्यधिक जनप्रिय है और यहां के वैवाहिक गीतों में इसका विशेष स्थान है। यह गीत कई व्यक्तियों द्वारा अनेक पुस्तकों एवं पत्रिकाओं में छपवाया जा चुका है। परन्तु इस गीत का सर्वांगपूर्ण रूप श्री मनोहर शर्मा ने मरूभारती (भाग 8 अंक 3) में प्रस्तुत किया है, जिसमें गीत का कोई भी स्थल नहीं छूटा है। इसी प्रकार जलाल के सम्बंध में ‘जलालो बिलालो घर आवसी’ एक विशिष्ट लोकगीत है। पहिले इस गीत में केवल जलाल और बूबना सम्बंधी दोहे गाए जाते थे परन्तु आजकल जानकारी के अभाव में इस गीत के साथ कोई भी श्रृंगारिक दोहा लगा कर गा लेते हैं। यह दशा केवल इसी गीत की नहीं है बल्कि प्रायः सभी दोहों वाले गीतों में अप्रासांगिक दोहे कह दिए जाते हैं। गांवों में रहने वाले लोग तो गीत की विशुद्धता का फिर भी ध्यान रखते हैं पर शहरों और कस्बों में रहने वाले गायकों को शुद्धता का ज्ञान कम है। मैंने यह देखा है कि लंगा-मिरासी आदि जाति के गायक गीतों के बोलों की विशुद्धता का पूरा खयाल रखते हैं तथा उन्हें गीतों की पृष्ठ भूमि का परिचय भी अच्छा है। वे सांस्कृतिक गीतों का मर्म समझते हैं और इतिहास से भी परिचय रखते हैं। इस क्षेत्र में काम करने वाले विद्वान इन गायकों से बहुत कुछ जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
कहा जाता है कि जलाल को जब रण क्षेत्र में भेजा गया था तब बिरहाकुल बूबना प्रतिदिन एक गीत बनाकर गाती थी। उस गीत में जलाल के प्रति उसका असीम अनुराग और प्रेमव्यथा भरी रहती थी। यहां जो दो गीत दिए जा रहे हैं, उनमें बूबना के उद्गार हैं। इसी प्रकार दोहे भी बड़ी संख्या में कहे गए थे। कहा जाता है कि ‘जला’ सम्बंधी 360 दोहे थे। इस विषय में शोध की आवश्यकता है। आगे गीत प्रस्तुत किए जाते हैं :-
[1]
म्हारो जलालो बिलालो घर आवसी, ए म्हारी माय।
म्हें तो डागळिये चढ जोवूं, म्हारे जलाले बिलाले री बाटड़ी ए माय।
म्हारी आंखड़ली फरूके जलो घर आवसी ए माय।
म्हूं तो कोयलड़ी बण जावूं, म्हारे जलाले बिलाले री आप री ए माय।
ऊभोड़ी कुम्हलीजूं ए कँवळ के रे फूल ज्यूं ए माय।
म्हारो जलालो बिलालो घर कद आवसी ए माय।
म्हारा करहलिया करूके जलो घर आवसी ए माय।
म्हारो बांकड़ली मूंछां रो जलो घर आवसी ए माय।
दोहा
नौ मण तो केसर उडी, सौ मन उडी गुलाल।
बूबन हंदा महल में, रात्यूं रमियो जलाल॥
म्हारी आंखड़ली फरूके जलो घर आावसी ए माय।
म्हारो जलालो बिलालो घर आवसी ए माय।
दोहा
जलाला थां बिन कोटड़ी, चंद बिहूणी रैण।
तो आयां चांनण हुवै, दीसै भला ज सैण॥
म्हारी आंखड़ली फरूके जलो घर आवसी ए माय।
म्हारो जलालो बिलालो घर आवसी ए माय।
जलाला दोऊं हत्थड़ा, कै मूंछां कै मुंठ।
गोरी कठण पौधरां, एराकी री पूठ॥
दोहा
म्हारी आंखड़ली फरूके जलो घर आवसी ए माय।
म्हारो जलालो बिलालो घर आवसी ए माय।
मेरे सजण मींत तुम, प्रीतम तुम परमांण।
मोनू पग री मोचड़ी, करियो जांण जलाल॥
म्हारी आंखड़ली फरूके जलो घर आवसी ए माय।
म्हारो जलालो बिलालो घर आवसी ए माय।
दोहा
माई म्हारा कोई रे बतावो जलाजी नै आवता
जलाला भूलूं नहीं, बिलाला का बैण।
घोड़ो चढ नै राखिया, लाल गुलाबी नैण॥
माई म्हारी ए बींभलिया नैणां रो जलो म्हारो,
माई म्हारी कोई रे बतावो जलाजी नै आवता।
दोहा
जलो ऊभो बजार में, कूदा रह्यो केकांण।
साम्ही ऊभी बूबना, बावै विरह रा बांण॥
माई म्हारी फरहरिये फोजां में जलो लागै फूटरो,
माई म्हारी कोई रे बतावो जलाजी ने आवता।
दोहा
पागड़ियां पचास लड़, कांधे दुपट्टो लाल।
भरी सभा में ओळखं, म्हारो सैंण जलाल॥
माई म्हारी लाखां री बधाई जले मारू री म्हां देवां,
माई म्हारी कोई रे बताओ जलाजी ने आवता।
दोहा
म्हूं घरणी कबूतरी, चढ जावूं अकास।
वां सूं खावूं लोटणी, पड़ूं जला रे पास॥
माई म्हारी ए बांकड़ली मूंछां रो जलो लागे फूटरो,
माई म्हारी कोई रे बतावो जलाजी ने आवता।