संसार री भासावां बोलियां रो सर्वेक्षण करणिया भासाविदां रो मानणो है कै आखै जगत मांय 7000 सूं बेसी बासावां बोलियां है, जिणां मांय सूं अेकलै अेसिया महाद्वीप मांय 2500 भासावां बोलियां है। संसार री भासावां रो अध्ययन करण आळी संस्था अेथनोलॉग (Ethnologue) मुजब तो आज ई संसार मांय 7,111 भासावां बोलीजै। आपां नै आयै दिन दुनिया री नवी-नवी भासावां बाबत मोकळी जाणकारियां मिल रैयी है। अै भासावां अर बोलियां जींवती अर गतिसील है अर आंनै वै समुदाय बोलै जिणां रो जीवण तेजी सूं बदळती दुनिया मांय आपरो ‘आपो’ खोवण रै कगार माथै है। भासावां री दीठ सूं ओ अेक खतरनाक बगत है, क्यूंकै मोटै तौर माथै भासावां रो अेक तिहाई हिस्सो अबै बिलायग्यो है। दुनिया री आधी सूं बेसी आबादी फगत 23 भासावां बोलै जदकै दुनिया री दो तिहाई भासावां अफ्रीका अर अेसिया में बोलीजै।
दुनिया री भासावां रै आंकड़ा माथै चरचा करां तो ठाह पड़ै कै अफ्रीका 30 फीसदी, अेसिया 32 फीसदी, अमेरिका 15 फीसदी, यूरोप 4 फीसदी अर प्रसांत 19 फीसदी महाद्वीपां री स्थिति नै दरसावै। 86 लोग अेसियाई कै यूरोपीय भासावां बरतै। भासा रै सांधणापणै री दीठ सूं लगोलग अेसिया, अफ्रीका अर प्रसांत महाद्वीप सै सूं सांघणा है। नेशनल ज्योग्राफिक सोसायटी एंड लिंगविस्टिक इंस्टिटयूट फॉर एंडेंजर्ड लैंग्वेजेज मुजब हरेक पखवाड़ै अेक भासा मर रैयी है। सन् 2100 तांई दुनिया री 6 हजार सूं ई बेसी भासावां रो लोप होय सकै। इणां मांय सूं आखी दुनियां मांय 2700 भासावां अबार री घड़ी इण संकट सूं जूझ रैयी है।
यक्ष सवाल ओ है कै हकीगत मांय कित्ता लोग है जिका आपरी भासा बोलै अर आपरी भासा रै पेटै वांरी निस्ठा है। आपां मांय सूं घणाकरा लोग अेसियाई कै यूरोपीय भासावां बरतै। अबार रा सईकां मांय औपनिवेसिक पसराव रै सागै-सागै कीं क्षेत्रां री टणकी आबादी रा आंकड़ा अचंभै जोग है। इणसूं उलट 18.5 फीसदी भासावां भोत कम लोग बोलै। आं नैना-नैना समुदायां नै वैश्विक मंच माथै आवाज उठावण रो मौको ई नीं मिलै। आंरी आवाज नै हमेसा दबाय दी जावै, पण अै आपणी भेळप आळी भासायी-विरासत रा भोत बड़ा हिस्सा है। आखै जगत मांय भासावां असमान रूप सूं पसरयोड़ी है। आ प्रवृति साफ है कै कांई आपां पूरै क्षेत्र नै अेक इकाई मानां, कै उणसूं ऊपर या फगत वां देसां नै इकाई मानां, ओ देखणो घणो दिलचस्प है।
संसार री भासावां बाबत विगतवार अध्ययन करण वाळी संस्था अेथनोलॉग मुजब भारत सारू सूचीबद्ध भासावां री संख्या 460 है। आं मांय सूं 447 जींवती है अर 13 बिलायगी है। जींवती भासावां मांय सूं 419 स्वदेसी (Indigenous) है अर 28 गैर स्वदेसी। इणां रै टाळ 64 संस्थागत है, 119 विकसित होय रैयी है, 138 मजबूत स्थिति मांय है, 112 मुसीबत मांय है अर 14 अबार ई मरण लागरी है। भारत रा दूजा राज्यां री भांत राजस्थान में ई केई बोलियां बोलीजै। सन् 1961 री जनगणना रपट मुजब राजस्थानी री 73 बोलियां (रिकार्ड करीजी) मानीजी है। 2011 री जनसंख्या मांय वरणित आंकड़ां मुजब राजस्थान मांय 71 भासा अर बोलियां बोलण आळा लोग रैवै।
राजस्थानी किणी अेक स्थान विसेस में बोलीजण आळी भासा नीं है, बल्कै राजस्थान अर मालवा मांय बोलीजण आळी बोलियां (जथा-मारवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, निमाड़ी, मालवी आद) री भेळप नै दरसावणियो नांव है, जिको आं बोलियां रै सरब समावेसी रूप (Over-all form) मांय साहित्य में थापित है। इणरो विगसाव अेक लांबी अर सफींटवीं साहित्यिक परंपरा माथै टिक्योड़ो है। इण साहित्यिक सरूप मांय क्षेत्रीय विसेसतावां ई मत्तैई सामल हुयगी है। राजस्थान मांय जित्ती ई क्षेत्रीय बोलियां है, उणां मांय भासा-तात्विक दीठ सूं इत्तो कठैई आपसरी मांय विचार-विनिमय कर सकै। जद कदैई क्षेत्रीय प्रभात साहित्यिक अभिव्यक्ति मांय उभर आवै तो बो राजस्थानी री आपरी खासियत कै खास पूंजी बण जावै।
कैवण रो अरथ औ कै राजस्थानी बा सरिता है जिण मांय क्षेत्रिय बोलियां रूपी नैना-नैना नाळा अर जळधारावां मिल’र उणरा अभिन्न अंग बणग्या है। अेक सिमरध साहित्यिक भासा हुवण रै कारण राजस्थानी रो हिंदी-क्षेत्र घणो महताऊ अर उल्लेखजोग है। हिंदी री नैड़ली भासा हुवण रै कारण इणरी महत्ता औरूं बध जावै। हिंदी भासा रै वैग्यानिक पुनर्गठन सारू ओ घणो जरूरी है कै हरेक सीमावर्ती भासा कै बोली रो लूंठो अर गहन अध्यन करयो जावै, जिणसूं कै हरेक सीमावर्ती भासा कै बोली रो लूंठो अर गहन अध्ययन करयो जावै, जिणसूं कै हरेक सीमावर्ती भासा कै बोली रा महताऊ भेदक तत्व उजास मांय आय सकै अर आपां सगळी सुलभ सामग्री रो हिंदी रै हित मांय बेसी सूं बेसी सरब समावेसी दीठ सूं सदुपयोग कर सकां।
राजस्थानी रै भासायी क्षेत्र रै त्हैत आखै राजस्थान अर वरतमान मध्यप्रदेस तहैत सांस्कृतिक इकाई माळवै रो लूंठो क्षेत्र आवै, जठै रा वक्ता आपरी बोलचाल, स्थानीय पत्र-पत्रिकावां, अखबारां अर साहित्य लेखन मांय राजस्थानी नै बखूबी बरतै। ओ सरब समावेसी रूप आखै राजस्थान अर माळवै मांय आपसरी री विचार-विनिमयता री दीठ सूं बोधव्य है अर इण वास्तै ई आधुनिक साहित्य रचना मांय इणरो वैवार हुवै। राजस्थानी किणी अेक ठौड़ विसेस में बोलीजण आळी भासा नीं है, बल्कै राजस्थान अर माळवा मांय बोलीजण आळी मारवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, निमाड़ी, माळवी, शेखावटी अर जयपुरी आद बोलियां री भेळप नै दरसावणियो सिरोळो नांव है। अबार री घड़ी आखै जगत मांय राजस्थानी भासा बोलणिया लोगां री संख्या लगैटगै 11 सूं 12 करोड़ रै बिचाळै है। पण राजस्थानी री मानक (यादृच्छिक) बोलियां प्रदेस री लगैटगै 60 बोलियां रो गळो टूंप नाख्यो, जिणां मांय 7 सूं 9 आदिवासी बोलियां ई भेळी है। आं बोलियां री भासाविद जॉर्ज ग्रियर्सन ई भारत रै भासा-सर्वेक्षण मांय अणदेखी करी अर पछै वांरा परवर्ती भारतीय भासाविदां बां नैसर्गिक सिद्धांतां नै ई नकार दिया जिणां में कैयीज्यो हो कै संसार रा सगळा आदिवासियां री आपरी निजू भासावां अर बोलियां है।
राजस्थान माथै काम करण आळा भासाविदां रै पूर्वाग्रहां री पराकासठा देखो कै राजस्थान रै दिखणादै अर अगूणै भूभाग री सिमरध भीली, मीणा, सहरिया, गरासी, सिरोही अर मेर आद भासावां अर बोलियां री अणदेखी करीजी है, जदकै भीली भासा पश्चिमी इंडोआर्यन भासावां रो अेक समूह है जिणनै मध्य, पश्चिमी अर भारत रै पूर्वी भाग रा लगैटगै 60 लाख भील बोलै। इणनै भीली, भिलाळा अर राजस्थान मांय वागड़ी भासा रै रूप में जाणीजै। राजस्थान मांय वागड़ी है राजपूत-वागड़ी मानीजगी जदकै वागड़ी भीली भासा री अेक उपबोली है, जकी वागड़ भील प्रजाति बोलिया करै। इणी भांत मीणा आदिवासियां री मीणा-भासा माथै हाड़ौती रो अधिव्यापन (ओवरलैप) करीज्यो, जदकै उण बगत मांय मीणा आदिवासी समुदाय भीलां री भांत ई जूनो अेथनिक समूह है जिणरो दक्षिण अेसिया रा 101 जिलां मांय जबरो प्रभाव हो अर वांरी जनसंख्या 39,52,545 ही। भासाविदां री अणूती उपेक्षा रै उपरांत ई आदिवासियां रा कल्पनासील अर मेधासंपन्न मिनखां साहित्य सिरजण री जबरी प्रतिभा प्रदरसित करी। मीणा अर भील नृजातीय-समुदायां रा आगीवाण रैया है अर आं आदिवासियां रो सगळो साहित्य सिरजण मौखिक ई हुयो अर हस्तांतरण ई मौखिक इज हुवतो रैयो।
इण बाबत महताऊ बात आ है कै लिपि नीं हुवण रै उपरांत ई मीणां अर भीलां री साहित्यिक धरोड़ संपन्न अर सबळी है। साहित्य री सगळी विधावां जियां-कथा, गल्प, गीत, पहेलियां, मुहावरा आद सगळा-कीं आंरै कनै है। आंरी लोककथावां अर लोकगीत जीवण रा सगळा पखां नै दरसावै। हास-परिहास, जीवण-दरसण, खुद री उत्पत्ति, रोजीना री अबखायां, जलम सूं मिरतु तांई रा संस्कार, बाह्य जगत रै सागै बांरा अनुभव आद सगळा विसयां माथै इणां साहित्य-सिरजण करयो।
आदिवासियां री आपरी अभिव्यक्तियां सारू भीलां समेत सगळा आदिवासी समुदायां रै कनै ई बोली तो अबार ई है, पण लिपि कोनी। ओ इज कारण है कै लगैटगै सगळा आदिवासियां कानी सूं बोलीजण आळी भासावां अर बोलियां नै ओपतो आवकारो नीं दिरीज रैयो है। राजस्थान रा आदिवासी अंचळां री भासावां बोलियां नै अबार तांई यूरोपीय अर भारतीय भासाविद मोटै तौर माथै हाड़ौती कै जयपुरी समूह री बोलियां में इज गिणता आय रैया है जकी कै तार्किक अर भासा-वैग्यानिक दीठ सूं ना तो तरकसंगत है अर ना ई अैतिहासिक। राजस्थान रा आदिवासियां रै बोलण आळी भासावां बोलियां परिचै रूप मांय अठै राखीज रैयी है-
1) भीली
आ भारत री अेक खास आदम जात भीलां री भासा है। आ भील आदिवासी समुदाय री बोली है जिकी घणकरी डूंगरपुर अर बांसवाड़ा जिलां मांय बोलीजै। इणनै वागड़ी ई कैयीजै। पण आदिवासी भील समुदाय रै बोलण सूं इण रो नांवकरण भीली ठीक है। वागड़ी रो नांवकरण ग्रियर्सन रो करयोड़ो हौ। ओ वागड़ क्षेत्र रै आधार माथै करीज्यो हो चको तार्किक नीं लागै। भीली में भासा-भूगोल री दीठ सूं अध्ययन री मोकळी गुंजायस है। भीली बोली सुतंतर भासिक रूप धारण करण आळी खास आदिवासी बोली है। आ अगूण मांय गरासी अर मालवी, उतराधै अर उतराध-आथूण मांय मेवाड़ी आद बोलियां रै बिचाळै भासायी संक्रमण क्षेत्र रो निरधार पण करै। इणरी आपरी भासिक खासियतां है। भारत मांय गौंड अर संथाल आदम जातां रै पछै इणरी ठौड़ है। भीलां री घणी आबादी मध्यप्रदेस, महाराष्ट्र, गुजरात अर राजस्थान मांय है। भीली मूळ रूप सूं औष्ट्रिकी भीली ही, पण आज तो औष्ट्रिकी द्राविड़ी-आर्याई भीली है। खानदेस, राजस्थान अर मध्यप्रदेस री परबत-स्रेणियां अर गुजरात मांय सतपुड़ा सूं आथूण मांय समदर तांई पसरयोड़ै भूखंड नै इज भील देस मानीज्यो है। ग्रियर्सन रै मुजब भीली बोलियां रै क्षेत्र नै अेक इस्यो असम त्रिभुज कैयीजै जिणरो शीर्ष अरावळी परबत-स्रेणियां मांय अर आधार खानदेस जिलां री दिखाणादी-अगूणई सींवां मांय है।
भीली नैं भासा-भूगोल री दीठ सूं दो भागां में बांटी जाय सकै;
भीलदेसीय- बै बोलियां जिणां रो बरतारो भीलदेस री सींवां मांय हुवै।
भीलदेसेतर- बै भीली बोलियां जिकी भीलदेस रै बारला क्षेत्रां में बोलीजै-बरतीजै। भीलां रो संबंध अेक कानी राजस्थानी सूं है तो दूजी कानी गुजराती सूं। ओ इज कारण है कै कीं लोग इणनै गुजराती री उपभासा बतावै तो कीं लोग राजस्थानी री। साची बात आ है कै अै दोनूं प्राचीन रूप सूं संबद्ध है। अरावळी परबतमाळा जठै मारवाड़-सिरोही नै मेरवाड़ा-मेवाड़ सूं न्यारी करै, बठै न्यार री बोली नांव सूं अेक भील बोली चलत में है। आ कीं दूर तांई सिरोही राज्य मांय अर कीं दूर तांई मेवाड़ राज्य बोलीजै। मारवाड़ राज्य मांय न्यार री बोली रो आथूण आळो इलाको सोजत, बाली अर देसूरी परगनां रो अगूणो हिस्सो आवै। इण अंचल नै गोडवाड़ कैवै। इण मुजब अठै री बोली गोडवाड़ी बाजै। आ अेक रळी-मिळी बोली है, जिण मांय गुजराती-भीली रा मोकळा अर माळवी रा कीं रूप मिलै।
2) मीणा/मीना भासा
मीणा बोली राजस्थान रा आदिवासी मीणा/मीणा समुदाय री खास बोली है। मीणा समुदाय रै टाळ दूजा लई कीं समुदाय इण बोली नै बरतै। मीणा बोली रा दो उपरूप मिलै जिणां मांय उत्तरी मीणा बोली अर दक्षिणी मीणा बोली खास है। मीणा बोली नै पुराणी धारणावां रै आधार माथै हाड़ौती अर ढूंढाड़ी बोलियां में रळाईजी जिकी भासा-तात्विक दीठ सूं साव गळत तथ्य है। तार्किक दीठ सूं ई ओ तर्कसंगत नीं है कै राजस्थान रै दिखणादै छैड़ै सूं उतराधै छैड़ै तांई हजारूं मील तांई अेक इज बोली रो प्रभाव क्षेत्र हो। राजस्थान के बोली-भूगोल सर्वेक्षण मांय मिली सामग्री रै आधार माथै करयोड़ी भासिक विरोळ सूं ओ साफ हुवै कै मीणा बोली सुतंतर भासिक रूप धारण करण आळी बोली है। सर्वेक्षण री संप्राप्ति रै आधार माथै भविस मांय सकै। गूगल-सर्च मीणा बोली माथै रिसर्च कर रैयो है जिण सारू आं ओळयां रो लेखक मीणा भासा बोली रा 26 हजार सबद उपलब्ध करवाया है।
आ जुगां जूनै आदिवासी मीणा समुदाय कानी सूं बोलीजण आळी भासा बोली है। ओ नांव अेक भासा रै नांव रो बोध करावण री दीठ सूं प्रकल्पित करीज्यो, जिणसूं कै अेक कानी हाड़ौती अर दूजै कानी जयपुरी अर ढूंढाती सूं इणरी भिन्नता साव जाहर होय सकै। मीणा राजस्थानी भासा री अेक खास उपभासा (बोली) है जिकी मारवाड़ी रै पछै राजस्थान मांय सै सूं बेसी बोली जावै। इणरो भासायी क्षेत्र अगूणै राजस्थान रै झालावाड़ जिलै रै खानपुर कस्बै सूं लेयनै अळघै उतराधै-अगूणै राजस्थान रा अलवर-भरतपुर जिलां तांई पसरयोड़ो है। क्यूंकै मीणा आदिवासी राजस्थान रा जुगां जूना आदिवासियां मांय सूं अेक है, इण वास्तै राजस्थान मांय बसणिया आदिवासियां मांय मीणा आदिवासियां री जनसंख्या सै सूं बेसी है। इण भासा रो प्रसार झालावाड़, कोटा, बारां जिलां रा कीं भाग, बूंदी, टोंक, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर जिलै रा कीं भाग, दौसा, अलवर अर भरतपुर जिलै रा कीं भागां अर जयपुर जिलै मांय खास रूप सूं है।
इण सर्वेक्षण रै त्हैत मिल्या भासिक तत्वां रै आधार माथ अगूणै राजस्थान रै सवाई माधोपुर, करौली, भरतपुर रो आथूणो हिस्सो, टोंक रो अगूणो हिस्सो, बूंदी-कोटा रो अेक तिहाई हिस्सो, बारां रो दो तिहाई हिस्सो अर झालावाड़ जिलो इणरो भासायी क्षेत्र है। सागै ई भीलवाड़ा है जहाजपुर, कोहड़ी, मांडलगढ, चित्तौड़गढ रा मेनाल अर बेगूं में ई आ भासा अेक दूजै रूप में बरतीजै। इणरै अगूण मांय जयपुरी, दिखणाद-आथूण मांय किशनगढ़ी अर हाड़ौती, दिखणाद मांय मालवी, दिखणाद-अगूण मांय बूंदेली अर सहरी भासावां बोलीजै। संसार री खास भासावां री पोथी अेथनोलॉग (Ethnologue) मांय वरणित सूची में मीणा भासा कोड (myi) रै सागै 1971 री जनसंख्या मुजब इणनै बोलण आळां री संख्या 900000, 1991 मांय 1900000 दरसाईजी है अर 2001 मांय 3800000 अर 2011 मांय 5200000 मानीजी है।
मीणा भासा जूनै जमानै सूं आपरी भासिक खासियतां नै धारण करयोड़ी है, पण दुरभाग सूं किणी पण भासाविद कै सोधार्थी इणरी खासियतां नै माथै ध्यान नीं दियो। कारण कीं ई रैया हुवै, पण संसार री भासावां मांय मीणा भासा रै नांव रो उल्लेख मिलै। मीणा भासा माथै शोध कारज री घणी जरूत है, जिणसूं इणरै सरूप माथै गहनता सूं उजास न्हाख्यो जाय सकै। सर्वे रै दौरान क्षेत्रीय स्तर रा भेद ई साम्हीं आया है, जिणां मांय झालावाड़ श्रेत्र री मीणा बोली, सवाई माधोपुर क्षेत्र री मीणा बोली, दौसा-अलवर क्षेत्र री मीणा बोली रो रूप खास तौर सूं मिलै। इण आधार माथै इणनै दो भागां मांय बांटी जाय सकै-उत्तरी मीणा बोली अर दक्षिणी मीना बोली, जिणां मांय वाचिक स्तर माथै क्षेत्रीय भेद मिलै।
3) गरासी
‘गरासी’ सुतंतर भासिक रूप धारण करण आळी आदिवासी बोली है। आ बोली अगूण में माळवी, उतराध में मेरवाड़ी, दिखाणाद-आथूण में भीली आद बोलियां रै बिचालै भासायी संक्रमण क्षेत्रां रो निरधारण पण करै। इणरी आपरी भासिक खासियतां है। ग्रियर्सन आबू क्षेत्र रै आदिवासियां री सिमरध भासा/बोलियां री घालमेल करनै यादृच्छिक रूप सूं आंनै मारवाड़ी अर मेवाड़ी मांय रळाय दी, जिको किणी तरै सूं तार्किक नीं है। ‘गरासी’ गरासिया आदिवासियां (जनजाति) री बोली है जिकी राजस्थान रै प्रतापगढ जिलै में खास रूप सूं बोलीजै। इणरै उतराध में मेवाड़ी दिखाणाद-आथूण में भीली अर अगूण मांय माळवी बोलीजै।
4) मेरवाड़ी
मेरवाड़ी बोली सुतंतर भासिक रूप धारण करण आळी बोली है जिकी नै मेर आदिवासी आपरी बोल बंतळ मांय बरतै। आ आपरै नैड़ली बोलियां रै बिचाळै आवण आळै भासायी संकमण क्षेत्र रो निरधारण ई करै। इणरी आपरी भासिक खासियतां है। इण बोली नै मारवाड़ मांय गिरासियां री बोली कै न्यार री बोली कैयो जावै। मेरवाड़ा अर मेवाड़ रै बिचाळै रो प्रदेस है। राजस्थानी री आ मेर आदिवासियां (जनजाति) री बोली अजमेर (मेरवाड़ा) री ब्यावर तैसील रा दो-तिहाई अर पाली जिलै री खारची, सोजत अर रायपुर तैसील रै अेक तिहाई भाग अर भीलवाड़ा रै उतराधै-आथूणै हिस्सै देवगढ अर भीम री भासा है। खास रूप सूं भीम तैसील इण रो केंद्रीय स्थल मान्यो जाय सकै। लगैटगै 700 वर्गमील मांय पसरयोड़ी आ बोली अरावळी स्रेणी अर अगूणी-आथीणी तळहटी तांई जावै। जूनी ब्यावर घाटी रै च्यारूंमेर अरावळी री नैनी-नैनी भाखरियां सूं घिरयोड़ो मसूदा घाटो, सेंदरा घाटो अर चाँत्र घाटो आद इणरा भासायी क्षेत्र है। आं दुरगम घाटियां अर आसै-पासै री भाखरियां माथै मेर जाति रो बासो है।
इण श्रेत्र री बोली माथै लूंठै शोध कारज री जरूत है, जिणसूं कै थोड़ी-थोड़ी भांय मांय बोली रा बदळता रूपां रै कारणां रो पतो लगायो जाय सकै। इणरै उतराध मांय अजमेरी, अगूण मांय मेवाड़ी अर दिखणाद-आथूण मांय मारवाड़ी बोलियां रा भासायी क्षेत्र है।
5)सहरी
‘सहरी’ राजस्थान रा सहरिया आदिवासियां (जनजाति) री आपरी भासा है, जिकी बारां जिलै री रामगढ, किशनगंज, शाहबाद तैसीलां मांय बोलीजै। पारवती नदी रै आसै-पासै रो इलाको इणरो केंद्र मान्यो जाय सकै। ग्रियर्सन आदिवासियां री इण सिमरध बोली सहरी नै घालमेल करनै यादृच्छिरक रूप सूं हाड़ौती मांय रळयोड़ी मान ली, जिको ना तो तार्किक है अर ई न्यावसंगत। अबार लग हुयोड़ा शोध कारजां मांय हाड़ौती नै इज इण क्षेत्र री भासा मानीजती ही, जिको ना तो तार्किक है अर ना ई भासा-तात्विक दीठ सूं विग्यान-सम्मत। इणरै तीन कानी ‘मीणा भासा’ बोलीजै अर अेक कान बूंदेली बोलीजै। राजस्थान मांय बारां जिलै री चार तैसीलां किशनगंज, शाहबाद, अटरू, मांगरोल आद मांय सहरिया आदिवासी मोकळायत में रैवै। इण आदम जात नै जंगळां में रैवण रै कारण सहरिया कैवै। सहरा फारसी मांय जंगळ नै कैवै अर सहरा (जंगळ) माथै निरभर रैवाणियां लोगां नै सहरिया कैयीजण लाग्यो। सागै ई सहरिया जनजाति री भासा हुवण सूं इणनै सहरी नांव दिरीज्यो। इण वास्तै बांरी आपसरी री बात-बंतळ सारू बरतीजण आळी भासा नै सहरी कैवै।
टूकै में, औ कैय सकां कै मीणा, भीली, गरासी, मेरवाड़ी अर सहरी जैड़ी आदिवासी भासावां री ग्रियर्सन जैड़ा ख्यातनांव भासाविद ई अणदेखी करी अर उणां इणरी सिमरध परंपरावां अर गीरबैजोग संस्कृति नै हाड़ौती भासा रो इज अंग मान लियो। राजस्थान रै बोली-भूगोल रै सर्वेक्षण री बगत आं ओळयां रै लेखक रै निरदेसन मांय सर्वेक्षक-टीम नै बां क्षेत्रां रै सर्वेक्षण रै त्हैत हासल सामग्री री विरोळ सूं ओ ठाह पड़यो कै अै सगळी भासावां हाड़ौती मांय किणी ई दीठ सूं सामल नीं करी जाय सकै। इण बाबत लूंठो सर्वेक्षण कारज करयां पछै ओ ई तथ्य साम्हीं आयो कै अै सगळा आदिवासी भारत रा जुगां जूना आदिवासियां मांय सूं महताऊ आदिवासी समुदाय है अर आंरी भासावां री आपरी खासियतां है।