गवरी नृत्य राजस्थान के मेवाड़ और वागड़ क्षेत्र की भील जनजाति, जिसमें उदयपुर, बांसवाडा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ और राजसमन्द जिले आते हैं— द्वारा किया जाता है। यह भीलों की प्रचलित एक लोक नृत्य परम्परा है, जो उनके धार्मिक जीवन के पक्ष हमारे सामने प्रस्तुत करती है।

 

गवरी नृत्य का उद्भव शिव और भस्मासुर की कथा-किंवदंतियों आधारित है। इस कथा का स्रोत पुराण, श्रीमद्भागवत गीता तथा भीलों का लोक जीवन है, ऐसी मान्यता है कि भस्मासुर नाम के एक असुर ने साधना के माध्यम से भगवान शिव से किसी को भी भस्म करने का शक्ति स्वरुप कड़ा प्राप्त कर लिया था, पार्वती को पाने की चाह पर भस्मासुर ने उस कड़े का प्रयोग शिव पर ही किया तो भगवान विष्णु ने अपनी शक्ति से मोहिनी रूप धारण करके भस्मासुर का हाथ उसी के माथे पर रखवाकर उसका अंत करवा दिया। इसी सन्दर्भ में शिव ने भीलों के साथ नृत्य किया, जो आगे चलकर गवरी के रूप में प्रचलित हुआ। इसलिए शिव भीलों के मुख्य देवता माने जाते हैं। गवरी नृत्य भीलों की श्रद्धा एवं भक्ति का एक प्रमाण है।

 

गवरी का आयोजन राखी के दूसरे दिन से आरम्भ होकर सवा महीने तक तक चलता है, इस अवधि में गवरी नृत्य करने वाले सभी पात्र धरातल पर ही शयन करते हैं। एक ही प्रकार की पोषाक धारण करते हैं। पांवों में घुँघरू बंधे रखते हैं तथा स्नान नहीं करते हैं। उनके दैनिक क्रियाकलाप गवरी के पात्र की भांति रहते हुए ही संपन्न होते हैं। इस नृत्य में मजीरा, चीमटा, मादल तथा थाली वाद्य यंत्रों का वादन किया जाता है। गवरी का आयोजन जिस गाँव में किया जाता है, वही गाँव आयोजन का खर्च वहन करता है। गवरी के लिए शकुन देखे जाते हैं। उसे गाँव के चौराहे से दिशा निश्चित कर आगे बढ़ाया है। गवरी की समाप्ति से दो दिन पूर्व जवारे बाये जाते हैं। और एक दिन पहले कुम्हार के यहाँ से मिट्टी का हाथी लाया जाता है, जिसे किसी जलाशय में विसर्जन किया जाता है या कहीं गाँव से बाहर गाड़ दिया जाता है।

 

इस नृत्य में मुख्यतः चार पात्रों की अवधारणा होती है— पहला पात्र ‘बूढ़िया’ होता है, जो भस्मासुर का जप करता है, ‘राया’ दूसरा पात्र होता है, जो स्त्री वेश में पार्वती तथा विष्णु का प्रतीक माना जाता है। झामट्या नामक पात्र लोकभाषा में कविता पाठ करता है, जिसे खट्कड्या नामक पात्र दोहराता है। बीच-बीच में जोकर नामक पात्र का प्रदर्शन आता है। अन्य पात्र— कंजर-कंजरी, मीणा, नट, बणिया, जोगी, बनजारा-बनजारिन, देवर-भौजाई, भंवरा, खड़लिया, हठिया, मियावड, सूअर, रीछड़ी, शेर, नार आदि नृत्य का प्रदर्शन करते हैं।         

जुड़्योड़ा विसै