‘गैर’, ‘घेर’ या ‘गेहर’ शब्द का अर्थ गोल घेरे में नृत्य करना होता है। यह होली के दूसरे दिन से शुरू होता है तथा लगभग 15 दिनों तक चलता है। मुख्यतः यह नृत्य मेवाड़ तथा बाड़मेर क्षेत्र में किया जाता है। इस नृत्य में पुरुष— जिन्हें ‘गैरिये’ कहा जाता है— लकड़ी की छड़ियाँ लेकर गोल घेरे में ढोल, बाँकिया तथा थाली वाद्य यंत्रों पर नृत्य करते हैं। गोल घेरे में घूमते समय ‘गैरिये’ कभी पास आते हैं तो कभी दूर जाते हैं। मेवाड़ के आदिवासी क्षेत्रों में इस नृत्य में गीत गाये जाते हैं, जो वीरोचित गाथा, प्रेमाख्यान एवं फसल की खुशहाली से जुड़े होते हैं। मेवाड़ के ‘गैरिये’ सफ़ेद अंगरखी, सफ़ेद सफ़ेद धोती और सिर पर लाल या केसरिया रंग की पगड़ी पहनते हैं। बाड़मेर के ‘गैरिये’ सफ़ेद ओंगी (लम्बा फ्रोक) पहनते हैं, ओंगी के ऊपर कंधे से कमर तक चमड़े का पट्टा बांधते हैं, जिसमें तलवार को रखा जाता है।
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