गींदड़ नृत्य राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र, सुजानगढ़, चुरू, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, सीकर और उसके आस-पास किया जाता है। यह सामूहिक नृत्य है, जिसे होली पर्व पर सात दिनों तक किया जाता है। गाँव के सभी लोग मिलकर खुले मैदान में एक मंडप तैयार करते हैं, जिसमें ‘प्रह्लाद’ की स्थापना की जाती है। स्थानीय भाषा में इसे ‘डांडा रोपना’ कहते हैं। इसमें ढोल, डफ और चंग वाद्य यंत्रों का वादन किया जाता है। नृत्य प्रारंभ करने से पूर्व सर्वप्रथम नगाड़ची मंडप में आकर प्रार्थना करता है, तत्पश्चात पुरुष नगाड़े की ताल पर अपने दोनों हाथों में छोटे-छोटे डंडे लेकर नृत्य शुरू करते हैं। नृत्य में डंडों का टकराव, पैरों की गति और नगाड़े की ताल तीनों का साम्य रखते हुए नर्तक अपने पास वाले नर्तक के डंडे पर नीचे झुक कर दाहिने हाथ से आघात करता है तथा दूसरा आघात ऊपर की ओर देखकर चेहरे के सामने करता है। इसी तरह घूमकर पीछे वाले पुरुष के साथ डंडे टकराए जाते हैं। यह विशुद्ध पुरुष नृत्य है। वस्तुतः कुछ पुरुष इस नृत्य में महिलाओं के वस्त्र धारण करके नृत्य करते हैं, जिन्हें ‘गणगौर’ कहा जाता है—

 

“गींदड़ खेलण म्हैं जास्यां
खाड खिचाले गींदड़ मांड पर रही नौबत चोट
खेलण म्हैं जास्यां
बांध के सूमल पागड़ी केसरिया बंडी पै’र
गींदड़ खेलण म्हैं जास्यां!”

 

इस नृत्य में विभिन प्रकार के स्वांग किये जाते हैं, जिनमें साधु, शिकारी, सेठ-सेठानी, डाकिया-डाकन, दूल्हा-दुल्हन, सरदार, पठान, पादरी, बाज़ीगर, जोकर, शिव-पार्वती, पराक्रमी
योद्धा, राम, कृष्ण, काली इत्यादि मुख्य हैं।

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