घुड़ला नृत्य जोधपुर क्षेत्र में गणगौर के आस-पास आयोजित किया जाता है। इस नृत्य का प्रदर्शन सुहागिन महिलाओं एवं कुंवारी कन्याओं द्वारा किया जाता है। छिद्रित घड़े में दीपक जलाकर उसे अपने सर पर रखकर महिलाएं नृत्य करती हैं, इस घड़े को ही ‘घुड़ला’ कहा जाता है। इस अवसर पर गौरी अर्थात् पार्वती और शिव की पूजा की जाती है।
इस नृत्य का उद्भव इस प्रकार हुआ है कि अजमेर का सूबेदार मल्लू खाँ मारवाड़ रियासत के विभिन्न क्षेत्रों पर हमले कर रहा था, एक बार उसने अपने सेनापति सिरिया खाँ एवं घुड़ले खाँ के साथ मारवाड़ के मेड़ता पर आक्रमण किया, मार्ग में उसने पीपाड़ में तालाब पर सुहागिनों को गणगौर पूजते हुए देखा, मल्लू खाँ सुहागिनों को लेकर अजमेर की ओर रवाना हो गया, यह समाचार जब राव सातल के पास पंहुचा तो उसने मल्लू खाँ का पीछा किया, मल्लू खाँ कोसाणा तक ही पंहुचा था कि राव सातल की सेना ने उस पर आक्रमण कर दिया, मल्लू खाँ और उसके साथी भाग छूटे, परन्तु उसका सेनापति घुड़ले खाँ मारा गया। राव सातल के सेनापति सारंग खीची ने घुड़ले खाँ का कटा हुआ सर राव सातल के सामने प्रस्तुत किया, राव सातल ने घुड़ले खाँ का सर मुक्त की गईं सुहागिनों को दे दिया, जिसे लेकर उन्होंने पूरे नगर में घूमकर राव सातल का आभार व्यक्त किया, घुड़ले खाँ के नाम पर ही इस नृत्य का नाम घुड़ला नृत्य पड़ा।
मारवाड़ क्षेत्र के कई गाँव में इस घटना की स्मृति में चैत्र कृष्ण अष्टमी को घुड़ला निकाला जाता है। घुड़ला घुमाने वाली महिलाओं को ‘तीजणियाँ’ कहा जाता है, इस अवसर पर गीत गाया जाता है—
“घुड़ले रे बांध्यो सूत, घुड़लो घुमैला जी घूमैला
सवागण बारै आव, घुड़लो घुमैला जी घूमैला!”