अग्नि नृत्य मूलतः जसनाथ सिद्ध गण करते हैं। यह नृत्य आग के धधकते अंगारों पर किया जाता है। इस नृत्य का उद्गम बीकानेर जिले के कतरियासर ग्राम से हुआ, जहाँ सिद्ध जसनाथ जी का समाधि स्थल है। अग्नि नर्तक ‘जसनाथी संप्रदाय’ के मतानुयायी एवं अधिकांशतः जाट जाति के लोग होते हैं। अग्नि नृत्य रात्रि जागरण के अवसर पर किया जाता है, जहाँ जागरण से पूर्व कई मण लकड़ियाँ जलाकर उनके अंगारे रखे जाते हैं, अंगारों के ढेर का माप लगभग सात फुट लम्बा, चार फुट चौड़ा एवं तीन फुट ऊँचा होता है, जिसे ‘धूणा’ कहा जाता है, धूणा के चारों ओर पानी का छिड़काव किया जाता है। इसमें एक गायक समूह होता है, समूह का एक सदस्य हाथों से नगाड़े की जोड़ी को बजाता है तथा ओंकार जैसी ध्वनि का आलाप करता है। पहले तीन शब्द जसनाथ जी के गाये जाते हैं, तथा चौथा शब्द ‘नाचणियों’ का गाया जाता है। सिद्ध गण द्रुत गति से ‘धूणा’ की परिक्रमा करते हुए गुरु को नमस्कार करते हैं, गुरु के आदेश के पश्चात् सिद्ध ‘फतै! फतै!’ उच्चरित करते हुए अंगारों पर नृत्य करने लगते हैं। अग्नि नृत्य में केवल पुरुष भाग लेते हैं, नर्तक— मतीरा फोड़ना, हल जोतना, आदि क्रियाकलापों से नृत्य में होली के फाग का दृश्य उत्पन्न कर देते हैं। आग के साथ राग और फाग का ऐसा अनोखा संगम अग्नि नृत्य के अन्यत्र कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। 
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