सीतारामजी लाळस माटसा’ब रै नाम सूं जाणीजता। नजीक रा लोग वांनै इणी नाम सूं बुलावता-ओळखता।
सीतारामजी मिडिल स्कूल री मास्टरी करता। खुद री स्कूल के कालेजी डिगरी बेमतळब ही। वे स्वयंपाठी विद्वान हा।
माटसा’ब आपरै जीवण में आ बात प्रमाणित करनै दिखायदी के डिगरी पांत विद्वत्ता सिरै है। उणरै वास्तै लगन, साधना अर ज्ञान ग्रहण करण री चेतना चाइजै।
सन 46-47 री बात हुवैला, बिज्जी, नारायणसिंह अर म्हैं माटसा’ब रै फतैसागर वाळै घर पूग्या अर वांरै सबदकोश रौ साक्षात् कर्यौ। अधूरा रजिस्टर हा अर अेकूकै सबदां री स्लिपां बण्योड़ी ही। सीतारामजी कनै नीं पूरा रजिस्टर हा अर नीं स्लिपां खातर पूरा कागद। वांरी तनखा ही 70-75 रुपिया महीनौ।
पण मन री अेक हूंस ही, कागद पेंसिल रा धणी हा। सबद रौ खजानौ किणी माया पत री आंधी कोठरी में बंद कोनीं हौ। सो माटसा’ब इण खजानै री निधि नै संवारता रह्या। वां सन 32 में काम सरू कियौ। म्हैं मिळ्या जद वांनै काम करतां नै दो दशक बीतग्या हा।
वखत री बात है। म्हैं अर बिज्जी ‘प्रेरणा’ मासिक संपादित कर्यौ। बीं रै सागै जीविया। सन 46 में ‘रूपम्’ नांव सूं अेक त्रैमासिक ई काढ्यौ। पण अेक अंक सूं ई धापणौ पड़्यौ। इणरै पछै चौपासणी सोध संस्थान री चरचा सरू होयी। नारायणसिंहजी उणरा निदेशक बण्या। उम्मीदां जागी के अबै जे कीं छापणौ चावांला वो छप सकैला। काम स्थाई होवैला। ‘परंपरा’ पत्रिका री आ पृष्ठभूमि ही। इणरा ‘लोकगीत’ अर ‘गोरा हटजा’ दो अंक निकळया। ‘परंपरा’ मासिक रै सागै राजस्थानी भाषा रै काम री हूंस ही। सीतारामजी राजस्थानी सबदां रा पारखी अर सबदां री जिंदगी जीवणिया हा। उण वखत वां सूं मिळणौ, वखत री मोटी जरूरत बणगी।
सवाल हौ कै कांई चौपसनी शोध संस्थान सूं माटसा’ब रौ सबदकोश छापीज सकै? बीज त्यार हौ, उणनै जमीं, पाणी अर हवा री जरूरत ही। बात बणगी। खेजड़ला ठाकर भैरूसिंहजी अर सिरीयारी कुंवर सा’ब चौपासणी रा करता-धरता हा। वांरी मंसा सूं सोध संस्थान री थरपणा हुयी ही। वां इण नुंवै प्रस्ताव नै मंजूर कर लियौ।
प्रसव री भांत सबदकोश रौ जनम ई कष्ट सागै हुयौ। प्राकृतिक के सहज जनम नीं हुयौ। उणरी कथा-कहाणी रा पात्र आज ई जीवता है अर मन में सबनै सगळी बातां, संवाद अर कारज याद है। हरेक खुद रै वैवार अर परिणावां रौ पारखू है अर सायत आपरै काम सूं पूरण संतोषी ई है पण केई छोटा-मोटा वैवार सबदकोश री छपाई रै वास्तै घणकरा रोड़ा उपजाया। भावी प्रबळ ही जकौ कोश नै छपाय’र समाज रै सामी लाय सक्यौ।
सीतारामजी सबदां रा तो मालिक हा पण वांरै कनै नाणै रौ तोटौ हौ। इण तोटै नै कदैई किणी रौ साहरौ मिळ्यौ तो कदैई किणी रौ। उदैराजजी उज्जवळ आपरा संबंधां रै मारफत माटसा’ब नै थोड़ा घणा पइसा दिराया। कागद, रजिस्टर, स्याही, कलम इत्याद री व्यवस्था करी। उदैराजजी खुद विद्वान हा। माटसा’ब वांसूं सबदां री समझ खातर सवाल ई करता रह्या। इणी जड़ परवाण अेक दिन अैड़ौ आयौ के कोश रै खातर मिळ्योड़ी रकम सूं दस आना, छ: आना बंटवाड़ौ हुयौ। अेहड़ा बंटवाड़ा में में विद्वता रौ लेखौ-जोखौ नीं हुयौ। लेखौ जोखौ इण बात रौ हुयौ के मामूली रुपिया टका कुण भेळा कराय सक्यौ?
वखत-वखत री बात, सन 40-45 रै पैली रा विद्वान आपरै काम नै छिपायनै राखता। वांनै हमेस ओ डर रैवतौ के कोई दूजौ उणरै काम रौ प्रयोग नीं करले। वां दिनां री बातां सुणां तद ठा पड़ै के पढण नै लेख भेज्यौ, साल डोढ साल उणरौ पतौ ई लाग्यौ अर वो ई लेख अचाणचक दूजै रै नांव सूं कठैई छप जावतौ। साहित्य री चोरी आज ई घणी दोरी कोनीं। पण वां दिनां ओ चाळौ घणौ ई हौ। माटसा’ब ई संदेह रा इण घेरा री उपज हा। जठा तांई संभव हुवतौ वे आपरै काम नै बतावतां डरता, झिझकता। खुद रै अनुभवां रै आधार माथै परगट होवण सूं बचता रैवता। संदेह री वारी प्रकृति वांरै जीवण मे छेहलै छिण तांई कायम रैयी।
बिज्जी अर म्हारै माथै वांरौ विस्वास हो। आंधौ भरोसौ हौ। पण बिचाळै अेक वखत इसौ ई आयौ—जद कदैई माटसा’ब जे कठैई रस्तै में दिख जावता तो छिपण री कोशिश करता। म्हां लोगां सूं बचण री कोशिश करता। म्हांरै घरां आवणौ-जावणौ बंद कर दियौ। बिज्जी रै वास्तै वे कैवता के आ तो बिजळी है—जे कड़क नै पड़ी तो राख री ढिगली कर देवैला। इण अविश्वास रै लारै संदेह प्रमुख बात ही। वांनै दूजौ भय हौ। बिज्जी, म्हारै अर चौपासणी री संस्था रै बिचाळै खांचाताण हुयगी। अे बिगड़्योड़ा संबंध कठैई कोश नै हाण नीं पुगायदै। अेहड़ा दो तीन बरस निकळग्या। पण धीरै-धीरै वांरौ विस्वास पाछौ जाग्यौ। कोश नै चौपासणी शोध संस्थान सूं बारै काढ नै अेक उप समिति बणाईजी। माटसा’ब सबदकोश रै काम खातर सरकारी स्कूल सूं कागद डेपुटेशन माथै लिरीज्या। 75 के 85 रुपिया मासिक अर 20 प्रतिशत डेपुटेशन अेलाउंस। इण भांत 95-200 रुपिया मासिक वेतन माथै माट सा’ब रौ सबदकोश त्यार होय रह्यौ हौ। ओ बेतनमान 4-5 बरसां तांई चाल्यौ।
सन 64-65 में कीं इस्यी परिस्थितियां बणी जिणसूं सबदकोश री उपसमिति री थरपणा संभव हुय सकी। माट सा’ब नै 250-500 री वेतन श्रृंखला में लाय सक्या। बिज्जी अर म्हारी इण काम में पूरी मदद रैयी। वां दिनां मदद देवण रा खास कारण हा। माट सा’ब रौ पाछौ विश्वास जाग्यौ जकौ जीवण रै अंत तांई कायम रह्यौ।
अेकर सीतारामजी नै म्हैं कह्यौ के आप सबदकोश री रचना रै अनुभवां नै जीवणी रै तौर माथै लिखणौ सरु करौ। ओ काम वां सरु ई कर्यौ। सौ-डोढ सौ पाना ई लिख्या। माट सा’ब रा लिख्योड़ा वे पाना आज ई मौजूद है। पण वांरै इण लेखन में महत्ता मिळगी, वां घटनावां नै जिण कोश रै बणण छपण रै साधनां नै जुटावण री कोशिश करी, कठैई बिगाड़ कर्यौ, कठैई सुधार कर्यौ। पण बातां कोश सूं संबंधित ही, उणरी व्यवस्था सूं जुड़्योड़ी ही। पण सबदां रै मायाजाळ नै खोलण अर बिखेरण री चरचा-प्रक्रिया गायब ही।
राजस्थानी हिन्दी सबदकोश अेकलै आदमी रौ प्रयास हौ। लेखक अनेक दूजा भाषायी कोशां रौ सहारौ लियौ—वे किसा कोश हा, सबदां नै वर्णमाळा सूं जमावण नै वे किण-किण चीज रा आधार बणाया, सबदां नै कठै-कठै सूं भेळा किया, अरथावण वास्तै किसा-किसा सिद्धांत काम में लिया, व्युत्पत्ति वास्तै किणरौ सहारौ लियौ, बोलचाल रा सबद वांरै हाथ किंयां आया, किसा-किसा सबद वां नै मन सूं घड़णा पड़्या, किसा सबद इसा है, जिणांरौ अरथ तो उणां दे दियौ पण मन नै हाल तांई संतोष कोनीं? सबदां री शक्ति वांनै किंयां लागी, अरथां सूं न्यारा किण विध, राजस्थानी सबदां रा हिन्दी अरथ देवण में कठा सूं सहारौ लियौ? राजस्थानी-राजस्थानी कोश क्यूं नीं बणायौ? द्विभाषी कोश बणावण रौ वांरै मन में कांई कारण हौ? इण भांत म्हैं चावतौ के माटसा’ब आपरी जीवणी रै माध्यम सूं भाषा री विधा माथै खुद रा अनुभव संजोय नै लिखै।
वां जीवणी लिखण रौ प्रयास कर्यौ पण वो लिख्यौ है रोज रै अनुभवां रौ, लोगां सूं विश्वास-अविश्वास प्राप्त होवण रौ अर सरकारी दफ्तरां री चिट्ठियां रौ।
माटसा’ब आपरी जीवणी अेकर पाछी लिखण री बात ई म्हनै दरसाई। पण म्हारी समझ में आ बात आछी तरियां आयगी ही के माटसा’ब लिखण री इण मंसा मुजब खुदनै टंटोळ नीं सकैला। तद तै कर्यौ के वांरी बातां टेप माथै लेयलां। म्हैं सवाल करूं अर आप वांरौ जवाब देवता जावौ। आ बात तीन च्यार साल चालती रैयी। पण गळती म्हारी ई रैयी के म्हैं वांरै चरणां में बैठ’र वांरै अनुभवां नै अंकित करनै वांरै वैयक्तिक अनुभवां रौ संकलन नीं कर सक्यौ, वखत कोई रै वास्तै ठैरै कोनीं। सूरज-चांद उगै अर आथमै। अेक दिन हमेस रै वास्तै आंख्यां ई मूंदणी पड़ै। माटसा’ब इणी नियति मांय म्हां लोगां नै आपरी रचना अर सबदकोश रै इंद्रजाल में छोड’र विस्तृत आभालोक री शरण लेय ली।