रात पर ग़ज़ल

उजाले और अँधेरे के प्रतीक

रूप में दिन और रात आदिम समय से ही मानव जिज्ञासा के केंद्र रहे हैं। कविताओं में रात की अभिव्यक्ति भय, आशंका और उदासी के साथ ही उम्मीद, विश्राम और शांति के रूप में हुई है। इस चयन में उन कविताओं को शामिल किया गया है; जिनमें रात के रूपक, प्रतीक और बिंब से जीवन-प्रसंगों की अभिव्यक्ति संभव हुई है।

ग़ज़ल5

कत्ती गोहरी काळी रात

सवाई सिंह शेखावत

आज गीत मांडो या

गोविन्द हाँकला

देख तो कतनी अंधारी रात है

हेमन्त गुप्ता पंकज

सूरज री करतूतां काळी

सवाई सिंह शेखावत