आँख पर दूहा

आँखें पाँच ज्ञानेंद्रियों

में से एक हैं। दृश्य में संसार व्याप्त है। इस विपुल व्याप्ति में अपने विविध पर्यायों—लोचन, अक्षि, नैन, अम्बक, नयन, नेत्र, चक्षु, दृग, विलोचन, दृष्टि, अक्षि, दीदा, चख और अपने कृत्यों की अदाओं-अदावतों के साथ आँखें हर युग में कवियों को अपनी ओर आकर्षित करती रही हैं। नज़र, निगाह और दृष्टि के अभिप्राय में उनकी व्याप्ति और विराट हो उठती है।

दूहा7

दोहा : भोजन

जयसिंह आशावत

नयण मिलंतां मन मिले

कवि केशव 'कीर्तिवर्धन'

नयन नयन पैं जात हे

कवि केशव 'कीर्तिवर्धन'

सर वीणा पद-तळ कमल

कवि केशव 'कीर्तिवर्धन'

नयणां सोइ सराहीये

कवि केशव 'कीर्तिवर्धन'

नयण पदारथ नयन रस

कवि केशव 'कीर्तिवर्धन'

नयण-बांण नारी तणे

कवि केशव 'कीर्तिवर्धन'