संपति चली न साथ, राज-पाट यांही रह्या।
हाल्या खाली हाथ, चक्रवर्ति नृप, चकरिया॥
भावार्थ:- हे चकरिया, (महान) चक्रवती सम्राट भी (इस संसार से) ख़ाली हाथ ही गए। उनके साथ धन-संपदा नहीं गई एवं उनका राजघाट भी पीछे यहीं रहा (तात्पर्य यह हे कि मृत्यु के पश्चात् सब-कुछ यहीं धरा रह जाता है) ।