जबर जबर जोधार, सहसबाहु शिशुपाळ सम।

छिन में हुयग्या छार, चिन्ह रह्यो नहिं, चकरिया॥

भावार्थ:- हे चकरिया, हे चकरिया, (हज़ार भुजाओं वाले) सहस्रबाहु औऱ (चेदि-नरेश) शिशुपाल जैसे बड़े-बड़े बलशाली योद्धा भी (मृत्यु उपरांत चिताग्नि में जलकर) क्षण भर में राख हो गए। उनका (संसार में) कोई निशान तक बाक़ी नहीं बचा।

स्रोत
  • पोथी : चकरिये की चहक ,
  • सिरजक : साह मोहनराज ,
  • संपादक : भगवतीलाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार
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