अंतै जहर उगळैह, होठां पर हंसी तिरै।

लुव-लुव नमन करैह, कारण मतलब कानसी॥

आप बणै अवतार, दूजै नै दानव गिणै।

अैड़ो नो इदकार, कीकर दिराजै कानसी॥

भाटां में भगवान्, किण देख्या किण पाविया।

पूजा रौ परवान्, कियां चठावौ कानसी॥

हुवै नह बैरी हैक, सैण हुवौ भल सैकड़ौं।

दुनिया अपणी देख, कायदै सूं कानसी॥

तीन दिन में तैयार, लाखौ दे निरभै नहीं।

धन रा लौभी धार, कणांई देखलो कानसी॥

फिलमां में फीटाह, प्रदरसण कर पैसा करै।

सुख भौगण सारूह, करै अनीति कानसी॥

रैही नह सीता नार, रावण सूं लांठा हुवा।

जौवौ जठै ही जार, कणांई मिलजा कानसी॥

सम्मता रौ चाळौह, निबळा नर नाटक करै।

जीणां सब जालीह, कार बिनारौ कानसी॥

नकली रूप रचाय, दर्‌पण में देखै ऊभी।

बौ भारत री नार, कियांक बदली कानसी॥

नित नाटक नूवाह, दिन रात दूजा हुवै।

चार दिन चालैह, कूड़ी बातां कानसी॥

नूवै दिन नागाह, आडै दिन अण्डा चढै।

इसड़ौ सूं अळगौह, कौनी रैवै कानसी॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कानसिंह भाटी ‘गड़ा’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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