वाह वा क्या खेल रचाया है।
तेरा भेद किसी नहिं पाया है॥
कहीं राजा है कहीं रानी है कहीं योगी पंडित ज्ञानी है।
कहीं वैद्य ज्योतिषी दानी है कहीं तापस वेस धराया है॥
कहीं गुरु बना कहीं चेला है कहीं नर-नारी का मेला है।
कहीं बैठा आप अकेला है कहीं कायर शूर कहाया है॥
कहीं पशु-पक्षी जलचारी है कहीं देव दैत्य तन धारी है।
कहीं स्वर्ग-पताल बिहारी है कहीं भूतल बीच बसाया है॥
कहीं भाई बंधु सुत नाती है कहीं नीच ऊंच कुल जाती है।
ब्रह्मानन्द कहीं दिन-राती है घट-घट में आप समाया है॥