हर हर जपल्यो भोळा जीव, संसार झैर मत पीव।

संसार झैर री बेल, परहर पाप धरम सूं खेल।

परहर पाप धरम दिढ़ राख, सत रा सबद लेवो गुरु भाख।

सत रा सबद लेवो तंत छाण, माणक बिणजो गा’क जाण।

पूंजी सारु विणज हलाव, म्हारै गुरु रै इसड़ो न्याव।

साच मनां रो राखां भाव, साचे मन गुरु चरणां चाव।

से नर करैं अलख री गाथ, गुरु जसनाथ धरै सिर हाथ।

वां गुरां रै लागूं पाय, भूल्या अंछर देऊ बताय।

अंछर देवै करै सहाय, तिण सुमर् यां दुख दाळद जाय।

दाळद जाय बहोड़ै भेव, उण सायब री करियां सेव।

नै-चै जपल्यो कवल्यो का’न, अंछर गुरु रो राखो कान।

तो पावो बैकूंठां मान, हिड़दै उपजै सत सिव ज्ञान।

भगवों भेष थळेसर थान, दोऊं कर जोड़ भणो भगवान।

लालू गावै गुरु री सेव, सबद कथ्या नर साचा भेव।

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : सूर्यशंकर पारीक ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : जनवरी
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