अचरज देखा भारी साधो।

अचरज देखा भारी रे॥

गगन बीच अमृत का कूवा झरे सदा सुखकारी रे।

पंगु पुरुष चढे बिनसीढी पीवे भर-भर झारी रे॥

बिना बजाये निश दिन बाजें घंटा शंख नगारी रे।

बहरा सुनसुन मस्त होत है तन की खबर बिसारी रे॥

बिन भूमी के महल बना है तामें जोत उजारी रे।

अंधा देख-देख सुख पावै बात बतावै सारी रे॥

जीता मर कर के फिर जीवै बिन भोजन बल धारी रे।

ब्रह्मानन्द संतजन विरला समझे बात हमारी रे॥

स्रोत
  • पोथी : श्री ब्रह्मानन्द भजनमाला ,
  • सिरजक : परमहंस स्वामी ब्रह्मानन्द ,
  • प्रकाशक : श्री ब्रह्मानन्द आश्रम पुष्कर, अजमेर ,
  • संस्करण : पाँचवा
जुड़्योड़ा विसै