चंद्रसखी
पंद्रहवैं सईकै री भगत कवयित्री।
पंद्रहवैं सईकै री भगत कवयित्री।
आज बिंद्रावन रास रच्यो है
आज महा मंगल गोकुल में
अब नहीं आवूंगो तेरै घरां ब्रजनारी
अंखिया में लागि रहे गोपाल
बंसी बजाई सांवरै
भजो सुंदर स्याम मुकटधारी
चढ बैठ्यो कदम की डाळियां
डस गयो आज नाग मोहे कारो
डस गयो काळियो नाग
ए जी म्हारा दीनानाथ मुरारी
ए जी म्हारा कृष्णचंद्र बनवारी
जा रे मोहन तोसैं प्रीत लगाई
जावो जावो रे कन्हाई
कैसे आयो मोरी बाखर में
खड़ी रहूं नारायण आगै, दरसण करकै जावूंगी
कौन गुन्हा दधि लूटी रे
मथरा मत जा गिरवरधारी
मिलता जाज्यो राज गुमानी
मोहना चले चलो कदम की छैंया रे
ओड़ निभाज्यो जी सांवरा
रुत आइ रे बोल मोरा
सूती नै सपनो आवियो
थारो मुख नीको है कै म्हारो राधे प्यारी
ऊधोजी, म्हारो कांईं गुन्हा-तकसीर
वै दिन सालै ओ म्हारा स्याम सुजान