वै दिन सालै ओ म्हारा स्याम सुजान॥
सरद पुन्यूं की रैन च्यानणी, बंसी की तोड़ी तीखी तान।
जमना तट पर रास रचायो, सहस गोप्यां बिच कांन।
रैन अंधेरी में बन बन डोली, आधी रैन मंझान।
दिवलो ले हर नैं ढूंढत डोली, पायो नहीं स्याम सुजान।
चंद्रसखी भज मन बालकृष्ण छवि, हर चरणां मेरो ध्यान।