सावण री वड़ तीज सहेल्यां, सब मिल न्हावण चाली

रुमक झूमक पग नेवर वाजै, सुघड़ सख्यां संग हाली

और सहेल्यां ईरां तीरां रुकमण वीच पधारी

जद ही जळ में डूबण लागी याद किया गिरधारी

पकड़ भुजा हरि बाहर कीनी कांइ वात विचारी

कौण देस में जलम थांरो कौण घरां अवतारी

कुनणापुर में जलम हमारो राजा भींव-कंवारी

दादी खीचण माय सोलंखणी हूं छूं असल पंवारी

वाचा द्‌यो भीसमजी री कंवरी पीछे घरां पधारो

वाचा तो म्हे जद ही देसां रूप चतरभुज धारो

रूप चतरभुज हरजी धार्‌यो रूप वण्यो चौधारो

औरां नै तो घुड़ला सोहै कृष्ण गरुड़ असवारो

सिव वाचा अर ब्रह्मा वाचा वाचा कृष्ण मुरारी

जलम जलम का साहब म्हारा हूं अरधंग्या थांरी

कहै कृष्णजी सुणो रुकमणी थे तो कुसी रहीज्यो

मा-बेटो कोइ मतो उपावै कागद वेगो दीज्यो

कहै रुकमणी सुणो कृष्णजी थे साची फुरमायी

लगन सांकड़ै सावो देवै कागद पूगै नांही

कागद लिख मीसर नै दीजै अेक मजल आय अैसी

अेक रात अेक घड़ी मांयनै कागद आयर देसी

वाचा देय भीसम री कंवरी रंगमहल में आयी

आगे माता खिजती बोली तै कठै वार लगायी

जळ में माता स्नान करंती आय गये कृष्ण मुरारी

वां देखत वाहर नहि निकसी लाज करी अत भारी

फिट फिट हे म्हांरी बाई रुकमणी कुळ नै काट लगायो

वडा घरां की बेटी हुय कर जाय ग्वाळ वतळायो

फिट फिट हे म्हारी माय सुलखणी उठ क्यों ना जाय परारी

पदम भणै प्रणवै पाय लागूं म्हारो वर गिरधारी

स्रोत
  • पोथी : रुक्मिणी मंगळ ,
  • सिरजक : पदम भगत ,
  • संपादक : सत्यनारायण स्वामी ,
  • प्रकाशक : भुवन वाणी ट्रस्ट, लखनऊ -226020 ,
  • संस्करण : प्रथम
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