मथरा मत जा गिरवरधारी। मथरा मत जा गिरवरधारी॥

बेण बजा ब्रज बनिता मोही, अरज करत सखियां सारी।

बिन दरसण ब्याकुल सब तन मन, अरज करत राधा प्यारी।

मथरा मांहीं बसत कूबड़ी जी, बस कर ले जादूगारी।

तुम तो स्याम सदा का कपटी, छांड चले सब ब्रज नारी।

कुबजा कुटिल कंस की चेरी, वा तो सोक लगे म्हारी।

चंद्रसखी दरसण की प्यासी, चरण कमल पर बलिहारी।

स्रोत
  • पोथी : चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि (पद संग्रह) ,
  • सिरजक : चंद्रसखी ,
  • संपादक : डॉ. मनोहर शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य समिति, बिसाऊ (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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