डस गयो आज नाग मोहे कारो॥

सुध बुध भूल गई सब तन की, ऐसो डंक मार्‌यो।

ब्रजमंडळ सै ल्यावो गारड़ी, प्राण बचावै ऐसो मिंतर म्हारो।

ओखद-ऊखद सभी लगाल्यो, मंतर लगै झाड़ो।

पढ पढ पाणी सोवां प्यावो, बंध दिये सैं कोनी आवै स्हारो।

मोर पंख हरी लेई हाथ में, देवण लाग्यो झाड़ो।

कंवर राधका यूं उठ बोली, तनक तनक मेरै आवै है स्हारो॥

चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, ऐसो प्रीतम प्यारो।

चरण-कंवल को लियो आसरो, सरण आये को सांवरा करो निसतारो॥

स्रोत
  • पोथी : चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि (पद संग्रह) ,
  • सिरजक : चंद्रसखी ,
  • संपादक : डॉ. मनोहर शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य समिति, बिसाऊ (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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