सखी री चंदन दूरि निवारि।

मेरइ अंग आगि सउ लागत, खत ऊपरि मानु खार॥

कुसुम माल व्याल सी लागत, फीके सब सिणगार।

चंद चंद्रिका मो न सुहावइ, जरि हइ अंग अपार॥

सेज निहेजी हुं दु:ख पाऊं, सीतल पवन न डारि।

पिय बिण सुख जिनहरख सबइं दुख, कहिहइ राजुल नारि॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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