मिलता जाज्यो राज गुमानी, थारी सूरत देख लुभानी॥

थे आवो सायबा धेन चरावण, मैं जळ जमना पाणी।

जे थे म्हारो नांव जांणो, मैं हूं राधा राणी॥

नंद महरजी कै दस घर आगै, रंगी पोळ नहीं छानी।

प्रीत करो तो प्रभु ऐसी करज्यो, जैसे दूध’र पाणी॥

एक दिन सांवरा म्हारे घर आवो, मैं हूं प्रेम दिवानी।

प्रेम भाव की करूं रसोई, भोत करूं मिजमानी॥

प्रीत लगा प्रभु पार मोहे कीज्यो, थे छो सारंग पाणी।

चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, हरि चरणां लपटानी॥

स्रोत
  • पोथी : चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि (पद संग्रह) ,
  • सिरजक : चंद्रसखी ,
  • संपादक : डॉ. मनोहर शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य समिति, बिसाऊ (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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