अब नहीं आवूंगो, तेरै घरां ब्रजनारी

अब नहीं आवूंगो, तेरै घरां ब्रजनारी॥

भूल गयो मैं डगर आपणी, बड़ गयो तेरी द्वारी,

लग गई ठोकर ढुळ गयो, महिड़ो, खिंड गए दध मटका री,

कहूं घर जावूंगो, ओर देवूंगो ल्या री॥

मेरो सो तेरो घर समझूं, बात कहूं मैं सारी,

जे मैं महिड़ो नहीं द्यूं ल्याकर, दिज्यो सौ सौ गारी,

मैं मर ज्यावूंगो, मारै मत हत्यारी॥

नाचूं नाच तेरै आंगण में, दे दे ठिमका तारी,

ग्वाळण, तेरी करुं आज सैं, नित नित ताबेदारी,

हुकम उठावूंगो, जैसे तूं महतारी॥

दे दे गुलचा गाल सुजा दिया, सब नस नस तोड़ डारी,

चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, चरण कंवळ बलिहारी,

नित गुण गावूंगो, जावूं मैं बलिहारी॥

स्रोत
  • पोथी : चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि (पद संग्रह) ,
  • सिरजक : चंद्रसखी ,
  • संपादक : डॉ. मनोहर शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य समिति, बिसाऊ (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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