जोवन ज्युं नदी नीर जात हइ अयाण रे।
काहे फूलि रह्यउ यउ तउ अथिर तुं जाणिरे।
जोवन मइ रातउ मदमातउ फिरइ जोर रे।
काम कउ मरोर् यु कछु देखइ नहीं ओर रे॥
कामिनी सुं चाहइ भोग सकल संयोग रे।
अलप जीवन सुख बहुत वियोग रे।
रूप देखि जाणइ मोसौ न को तीन भुंवन रे।
अइसउ अभिमानी तेरी गत हुइगी कउंण रे॥
अंजुरी कउ नीर रहइ, कहइ केती वेर रे।
तइसउ धन जोवन न, कोई ता मइं फेर रे।
भजि भगवंत जोवन कउ लइ लाह रे,
जउ जिनहरख मुगति की चाहरे॥