खड़ी रहूं नारायण आगै, दरसण करकै जावूंगी।
खड़ी रहूं नारायण आगै, दरसण करकै जावूंगी॥
गंगाजळ झारी भर ल्याई, इमरत मेह बरसावूंगी।
जाय छिड़कूं नारायण आगै, सूत्यो स्याम जगावूंगी॥
बाहर की तो बाहर रह गई, भीतर जाण न पावोगी।
भीतर की तो भीतर रह गई, बाहर आण न पावोगी॥
भरी चंगेरी बेल सोगरी, ये मैं कभी न खावूंगी।
मोतीचूर मगद का लाडू, मोहन भोग लगावूंगी॥
यो सांवरियो गोकल जासी, मैं भी गोकल जावूंगी।
यो सांवरियो रास रचासी, मैं भी रास रचावूंगी।
यो सांवरियो तान तुड़ासी, मैं भी तान तुड़ावूंगी॥
चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, हर चरणां चित्त ल्यावूंगी॥