जुगत बिन सतरंज जीत न जानी, आतम मूढ अज्ञानी।
जुगत बिन सतरंज जीत न जानी, आतम मूढ अज्ञानी॥
चौसट खण रो घर रचवायो, तामें सेन सजानी।
पैदल घोड़ा ऊंट अने कफ, मंड्यो जुद्ध मैदानी॥
उततें फौज अरी की आई, इत तें अपनी आनी।
कोपे सूर दोऊ जय कारन, भिरे महा अभिमानी॥
मन मुसकाय खेत के माहीं, बोल्यो मोटी बानी।
चंगी चाल चाह कर चूक्यो, गढ नंहं सज्यौ गुमानी॥
लागी फेट किस्त की लखिये, हुई इते बड हानी।
तीखे पग को एक तोरड़ो, कियो प्रथम कुरबांनी॥
निज दल छोड़ उजीर नीसर्यो, कायर पर दल कांनी।
अरी भट हाथ अपार अचांनक, घर की फौज घिरांनी॥
लागो दाव दुकिस्त लगाई, हट्यो खाय हहरांनी।
घबरायो घोरन को घेर्यो, पद न टिके मदपांनी॥
करी अपनें को अगर कीनों, केद रह्यो एक कानी।
मदत मिली नाहीं मन मानी, सारी सेन सिटांनी॥
दूजो ऊंट मर्यो विन दारू, जुगल अश्व कट जानी।
उडती किस्त लगी इक अबकी, धूर करी रजधानी॥
उजीर को एरे कर आतर, कातर टाट कुटानी।
वीती बात पर् यो अरि बसमें, पीछे लगे पछतानी॥
उमरदांन विवेक बिना बपु, पैदल खूब पिटानी।
बुरद भइ न भई चोमोरे, प्याद मात भई प्रानी॥
जुगत बिन सतरंज जीत न जानी, आतम मूठ अज्ञानी॥