कैसे आयो मोरी बाखर में, बता दे कान्हा मोय॥

मैं तो मेरे चौबारन में, रही अकेली सोय।

पकड़ हाथ तूं मोय जगाई, अकल गई कहां खोय॥

दोपैरी सैं मेरी काळी गैया, गऊवन में खोय।

खोजत खोजत आय गयो सखी, पतो बतादे मोय॥

जे मेरो गूजर जाग उठैगो, घणी लड़ाई होय।

तुमरो कान्हा कछु बिगड़े, मेरी फजीहत होय॥

खिड़की खोल’र मोय कुदा दे, कछु कहैगो तोय।

चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, नित नई लीला होय॥

स्रोत
  • पोथी : चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि (पद संग्रह) ,
  • सिरजक : चंद्रसखी ,
  • संपादक : डॉ. मनोहर शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य समिति, बिसाऊ (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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