ओड़ निभाज्यो जी सांवरा, ओड़ निभाज्यो॥
प्रीत करी तो ओड़ निभाज्यो, मतना लोग हंसाज्यो।
दूर गांव म्हारो बास जाण कर, मतना थे छिटकाज्यो॥
ऊंची मैड़ी लाल किंवाड़ी, सहनाणी लख आज्यो।
जे म्हारी नणदल बैठी होय तो, पूठा ही उठ जाज्यो॥
माखन मिसरी ओर दुध-पेड़ा, मन मानैं सो खाज्यो।
चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, नित बरसाणे आज्यो॥