ए जी म्हारा दीनानाथ मुरारी, अब तो रखियो लाज हमारी।
गज की टेर सुनत ही धाये, त्याग गरुड़ असवारी।
चक्र सुदरसण चल्यो ग्राह पर, गज की देह उबारी॥
कीन्यो कपट भूप दुर्योधन, द्रोपद करत उधारी।
कृष्ण कृष्ण कर टेरण लागी, चीर बदा दियो भारी॥
बिप्र सुदामा सखा जो आयो, बालकृष्ण की यारी।
दियो दळिदर खोय, बना देई सुबरण म्हल अटारी॥
द्वापर में नग राजा होयो, दानी बीर बलकारी।
अंध कूप सैं बाहर कर दियो, आप भगत हितकारी॥
सदा सहाय संतन की कीनी, क्यूं मोहि आज बिसारी।
चंद्रसखी भज बालकृष्ण छबि, चरण कंवल बलिहारी॥