रे जिय बातनि जनम गवायौ।

संग ही सदा रहै हरि तेरे, तासूं मन नहिं लायौ॥

लटकत फिरत घरैं घर डोलत, इत उत चितवत धायौ।

सेयौ नहीं निरजंन साहिब, ताकौ जस नहिं गायौ॥

जिभ्या स्वादि श्रवन रस लायौ, कियौ है इंद्रिन कौ भायौ।

टीला गुर दादू समझायौ, ‘तासौं’ चित नहिं लायौ॥

स्रोत
  • पोथी : संत टीला पदावली ,
  • सिरजक : संत टीला ,
  • संपादक : ब्रजेन्द्र कुमार सिंघल ,
  • प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, दरियागंज, नयी दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै