देखी मैं डाकणी जरखि चढी॥

लेवेका छोडण का नाँही, कोई अैसो मंत्र पढी॥

पाँच बीर जाकै संगि डोलै, सब जोगणी मन भावे॥

नगनि भई, चढबा कै कारणि, वन मैं जरख बुलावे॥

लापसङी का लोंदा करि करि, आपण पाइ खुलावे॥

जब यहु लोग सहर को सोवे, तबै सराडा द्यावे॥

पाडोसणि पण हाँते आई, संग मिली गटकावे॥

भूखी ह्वे तबही भख माँगे, मूँवा मसाण जगावे॥

बहुत सयाने पचिपचि हारे, कोई मंत्र लागै॥

जाली जलै जल में वूडै, नीसरि-नीसरि भागै॥

टूनर मंत्र सोकोत्री का सब, हरि को भजन उडावे॥

‘बखना’ अैसा गुरु हमारा, डाकणिलिया छुडावे॥

मनसा डाकणि मन जरख, दौङावै दिन राति॥

‘बखना’ कदेन ऊतरे, सांझ जिसी परभाति॥

स्रोत
  • पोथी : बखना जी की वाणी ,
  • सिरजक : बखना जी ,
  • संपादक : मंगलदास स्वामी ,
  • प्रकाशक : लक्ष्मीराम ट्रस्ट, जयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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