गावड़ी राखो हरि हावड़ी करती, वरजो राति पसर ऊछरती॥

गावड़ी राखो हरि हावड़ी करती, वरजो राति पसर ऊछरती॥

अह निस खेत पराया खाइ, नीसरि जाइ बड़ी हरिहाइ॥

वाछा वाछी लीया संगि धावे, मांहै सांड दड़ूकतो आवे॥

जे न्यूँजो तो न्याणों तोड़ै, लातां मारि दुहावणो फोड़ै॥

ठीगैं मारै सो पसवावे, खूँटै बांधी धेन दुहावे॥

दूध घणा दे भूखां मरती, जांण मति देहु जठे पहली चरती॥

घेरि घारि ‘बखनो’ घर आणैं, नीसरि जाइ तो परमेसुर जांणै॥

स्रोत
  • पोथी : बखना जी की वाणी ,
  • सिरजक : बखना जी ,
  • संपादक : मंगलदास स्वामी ,
  • प्रकाशक : लक्ष्मीराम ट्रस्ट, जयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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