जी म्हारा कृष्णचंद्र बनवारी, थारै चरण कमल बलिहारी॥

ब्रजभूमी में जलम लियो प्रभु, प्रथम पूतना मारी।

इंद्रसेन को गरब मिटायो, नख पर गिरवर धारी॥

खेलत गेंद गिरी जळ जमना, चढे कंदम की डारी।

पैठ पताळ काळीनाग नाथ्यो, फण फण निरत मुरारी॥

बिन्दराबन में रास रचायो, सोभा अचरज भारी।

बिच बिच गोपी स्याम बिराजे, ज्यूं चंदा उजियारी॥

महाबली कंसादिक मारे, भक्तन भये सुखारी।

उग्रसेन नैं राजतिलक दे, पुरी बसाई न्यारी॥

करो कृपा ब्रजनंद सांवरा, राखो लाज हमारी।

चंद्रसखी तुम रो जस गावै, चरण कंवल पर वारी॥

स्रोत
  • पोथी : चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि (पद संग्रह) ,
  • सिरजक : चंद्रसखी ,
  • संपादक : डॉ. मनोहर शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य समिति, बिसाऊ (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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