दूध की न मूत की, गाइ कहे सब कोइ॥
अैसी गाइ घर वारणे, वैरी कै मति होइ॥
दूजै व्यांइत व्याई गाई, तिहि नै गूजर दुहिबा जाई॥
सावण व्यावे हाथ न आवे, तिहिं का मछर कोंण उडावे॥
ले ले ठींगा दहूँ दहोड़े, चरबा तै मन रतीन मोड़े॥
खाँट इसी छींका का फोड़े, तिहिने बखना दुहिबा लोड़े॥
चंचल चपल चहूँ दिसि दोड़े, मगरे जाती कोंण वहोड़े॥
वागिन मिलै हिली हरिहाई, भागी फिरै नहीं ठहराई॥