डस गयो काळियो नाग, राधाजी की अंगुली में॥

राधा झूलण गई बाग में, सब सखियन के साथ।

ऐसो डंक दियो लहरी ने, पीळो पड़ गयो गात॥

नस नस सेती चुवै पसीनो, अंग रह्यो कुम्हळाय।

नाड़ी की गति मंद भई है, कीजै कोण उपाय॥

एक सखी पाणीड़ो ल्यावै, दूजी ढोळै वाय।

तीजी सखी तो ओखद ल्यावै, चौथी बैद बुलाय॥

बरसाणै सैं बैद बुलायो, बैठ्यो पिलंग पर आय।

नाड़ी की तो कदर जाणै, नैणां सैं नैण मिलाय॥

चंद्रसखी मोहन को मिलणी, मिलणो बारम्बार।

नंद महर को कंवर कन्हैयो, ले गयो लैर लगाय॥

स्रोत
  • पोथी : चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि (पद संग्रह) ,
  • सिरजक : चंद्रसखी ,
  • संपादक : डॉ. मनोहर शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य समिति, बिसाऊ (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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