भरमतो भरमतो, तुम्हारै सरणै आयो॥

दीन दयाल पतित पावन, एक तूँ ही बतायो॥

चौरासी लख भरमतो आयो, तुम्हारो घर नीठी पायो॥

अनाथ को नाथ एक, तूँ ही बतायो॥

और जे बाँधै धाइ, दाम दे लीजै छुङाइ॥

कर्म को बाँध्यो तुम्ह पै छूटै, रामइया राइ॥

सारां ही साधाँ बताई, उबरण की ठौर याई॥

बूझी बखनो सरण आयो, राखि लै राम राई॥

स्रोत
  • पोथी : बखना जी की वाणी ,
  • सिरजक : बखना जी ,
  • संपादक : मंगलदास स्वामी ,
  • प्रकाशक : लक्ष्मीराम ट्रस्ट, जयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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