भजो सुंदर स्याम मुकटधारी।

भजो सुंदर स्याम मुकटधारी॥

बदन कमल पर कुंडल झलकै, अलकैं सोवै घूंघरवारी।

उर बैजंती माळ बिराजे, बनमाळा साजै गुंजनवारी।

भाल तिलक केसर को सोवै, कर-मुरली छिब है न्यारी।

पांयन में पैंजनियां सोवै, गद गद आवत गिरधारी।

बंसीवट नट रास रच्यो है, संग लियां राधा प्यारी।

बिन्द्राबन में खेलत डोलत, बिहरत है नित बनवारी।

चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, चरण कमल पर बलिहारी।

स्रोत
  • पोथी : चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि (पद संग्रह) ,
  • सिरजक : चंद्रसखी ,
  • संपादक : डॉ. मनोहर शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य समिति, बिसाऊ (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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