अंखिया में लागि रहे गोपाल॥
मैं जमना जल भरन जात रही, फैलायो जंजाळ।
रुनक झुनुक पग नूपूर बाजे, चाल चलत गजराज।
जमना के नीरे तीरे धेन चरावे, संग सखा ब्रजराज।
बिन देखे मोहि कल न पड़त है, निशि दिन रहत बेहाल।
लोक लाज कुल की मरजादा, निपट जु भ्रम को जाल।
वृंदाबन में रास रच्यो है, सहस गोपी इक लाल।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे, गल बैजंती माल।
शंख चक्र गदा पद्म बिराजे, बांके नयन विसाल।
चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, चिरजीवहु नंदलाल।