रामचरण महाराज रा देखो निसांण।

दशौं दिशा में रूप रह्या राम भजन रै पांण।

राम भजन रै पांण कठिण कळ जुग रै मांही।

कहे दास संग्राम हलायां हलके नांहीं।

असुर अनेकां पचमुवा कहत को प्रवान।

रामचरण महाराज रा देखो निसांण॥

स्रोत
  • पोथी : रामस्नेही सम्प्रदाय ,
  • सिरजक : संत संग्रामदास ,
  • संपादक : वैध केवलराम स्वामी ,
  • प्रकाशक : स्वामी केवलराम आयुर्वेद सेवा निकेतन ट्रस्ट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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