अेक
सीख ज्हैर जो मानसी, हेत-प्रेम नै बाळ।
ठोकर खा पछतायसी, तरक बढावै झाळ॥
तरक बढ़ावै झाळ, हवा उळटी चाली है।
पूत बाप को बाप, बाप माथै खाली है॥
है घर-घर में घमसाण, इक दूजै स्यूं तीख।
घर का होवै टूकड़ा सासरलां री सीख॥
दो
पाई चोखी चाकरी, बण घाणी को बैल।
आंख्यां पाटी बांधकर, घूम घूम तूं छैल॥
घूम घूम तूं छैल, भयंकर बंधन पायो।
मस्त होयगी पस्त, अस्त हो जोबन धायो॥
काया होगी खीण, करम स्यूं छुट्टी पाई।
खोदी क्यूं ना घास, चाकरी चोखी पाई॥
तीन
नीम हकीमी डागदर, धनवन्तरि रा बाप।
पुरजा मांडै हांसकर, मार जोर की थाप॥
बाढै़ कारोबार, बार रोगीड़ा घालै।
घर नै करदे साफ, पण यै चगदु घालै॥
मुरदा नोचै कांवळा, सै आवै भाज कर।
जीवत नै बगसै नहीं, नीम हकीमी-डागदर॥
च्यार
भेडां बणकर घूमिये, रोज लुगाई गैल।
सुध-बध सारी भूलसी, नाच नचासी छैल॥
नाच नचासी छैल, नाक सूं पाणी प्यासी।
उळटा लेसी सांस, भाग कर कैयां ज्यासी॥
मंतर देसी मार, ठूंड कर मूंडै पेड़ो।
फंदो देसी घाल, घूम तूं बण कर भेड़ां॥
पांच
‘वाद’ बाद कर नाखियो, नाड़ी-टुट्या लोग।
थूक-थूक कर चाटग्या, और बढार्या रोग॥
और बढार्या रोग, भोग में डूब्या-डूब्या काठा।
उळटा लेसी सांस, पड़ैगा इणरै भाठा॥
काळ बडो विकराळ, व्है बाद कठै प्रतिवाद।
मिटै धूड़ में चाल, पण बाद हुवै नां ‘वाद’॥