कवित्त
इळ कसमीर निवास, अनै को इळै चाचरी।
उदयागिरि अस्तगिरि, धरा ब्रह्मंड सरभरी॥
धमळा कुंडळ वसन, रत्थ धमळा धमळा मति।
आतम आतम सकति, वेय गये त्ति व्रहं मति॥
माहेस वेस अंग आवरति, मांणसरि रमती रति।
काइब प्रमांण बंधिसि कहिसि, सा सुप्रसन्नवी सरसति॥
गय डंडीयळ कमळ, मके झळहळ दंताळं।
सुंडळ लवल विमळ, सिद्धिवर बुद्धि भुवाळं॥
प्रथम नाम उच्चरै, जा कोइ काम कळासै।
सह आरंभां तिलक, न को कहतां सम्भारै॥
माहेस हूंत ओपति सुमति, गुणसागर दीरघ उअर।
कवि सुमति उकती अखिर, तौ वर मांगि गणेसवर॥
छंद वेलियो
प्रणमीजै प्रथम चरण सीतापत, आदि प्राण त्रिभुवण में ईस।
दीनबंधु बहनामी दाता, जगत-पिता माता जगदीस॥
अविनासी पुरुष त्रिगुणामय ईसर, वेद रूप धरणीधर वीर।
नरहरि करुणाकर नारायण, सुक्खम गुण वैराट सरीर॥
गय कमळ मके झळहळ रद गुण मे, लळवळ सुंडांरव लख लाभ।
सुर असुर नाम हर सेवै, अकळि प्रमांण बराबरि आभ॥
धमळ रथ वसत्र कुंडळै धमहे, मति धमळा धमळा गिर मोह।
करणी धमळ धमळ वर काया, वाणी धमळ अविरळ मे वोह॥
गुण प्रसिधि वेदां भनि भिनिजै गावै, पावै पात्र दुलभ जग पूज।
देव क्रिपाळ हुवै तो दीसै, इळ पाताळ आभ अणसूज॥
कवि सरिसो मात प्रणाम अेणि क्रित, मंडौ तिणि मंडौ मिलणि।
रूपक कुळ चहुआंण रतनसी, भुजबळ बाखाणां भुअणि॥
कपि कमण पहुंचै सिहरै बळ करि, कुण चीत्रै असमांण करि।
पूरा कवि रतनसी प्रवाड़ा, अेकणि किणि कहिजै अखिरि॥
मै मति जाइ रतन महातम कहियै, अै उपहास करण आपांण।
अेर उड़प सौं बंधै आतम, मापै ऊ तरिवौ महिरांण॥
संकट सिरि आक तणां सेवंत्री, पारिजात चाढै़ पुहप।
मति पूजति सारै ले मेलै, बड़ा समांनै जात्र बप॥
देवे धर मारि पारके दुजड़े, की आपणी बड़ै अणभंगि।
खौंदाळम विच साजै खत्री, जुड़ि अरि थाट भांजिया जंगि॥
तिणि पाटि समरसी दूणो तपियो, नाम हजार गुणो नर लोइ।
हेकण व दुयण सौ हाडो, लाख गुणो ऊड़ंतै लोहि॥
नरपाळ हुऔ धकचाळां निवहण, चाळां ऊखेळां गुर चाउ।
रोपाळां सरिसो जुध रचियौ, ग्रहि परियां उजवाळां गाउ॥
हामां बरसिंघ सिंघ दोइ हुवा, सरिस त्रिसिंघ साहियै सार।
हिंदू तुरक पाधरै हिंदू, अनमीकंध बड़ा असवार॥
तै सागर ग्रिहि बैरागर तपियो, ऊजागर नागर कुळ अेक।
धामां जागां अरि सौं धारां, किरि धारां हर वार अनेक॥
तिण पाढी भांण सुरतांण त्रूटतै, अणीये फूटते अछळि।
कढी ले सिर कर घति कटारी, काढी सऊ कटारमलि॥
नरनाह सुपाह प्रतपियौ नरबद, महातियागी मोटमन।
पूरा दिन तेतला प्रवाड़ा, वाखांणै वरनो वरन॥
बंधव नरपाळ काळ बिजड़हथ, धड़छि समर कीधा धकचाळ।
धर रखपाळ धणी ऊपरि धर, बे रूड़ै काढिया बंगाळ॥
तिणि पाटि सुर भात्रीयो तपियो, जिणि बीजो जम जीरवीयो।
सूरिज रहै तते ळै साको, कियै मरणि जग सीसि कियौ॥
तै सुर तपति सुरतांण सोहीयो, धमळ रूप बळवंत सधीर।
माथै सींग बंधव मोड़ बंधा, भाजै आप काज विणि भीर॥
अरिजण अवतार सरीखो अरिजण, नरबद पाटि प्रतपियो नूर।
गढ चीत्रोड़ जेणि पडि़गाहे, सारां मुंहि ऊतरियो सूर॥
अरिजन ग्रिहि सुरजनराउ ऊपनो, महा प्रताप धरम मरजाद।
जुड़ तैं गढ़ चैरासी जीता, वंस खटत्रीस हारिया वाद॥
सुरताण काति धर लीधो सारे, अरथ कांम ध्रम मोख उगार।
सुरां चहुं सालिम सुरताणं, सालिम नूर बड़ो सिरदार॥
चत्र वरण च्यारि आश्रम वेदां चहुं, गढ़ तीरथ कुण देव गिणै।
जिणि विधि जके त्रिपति मन जांणै, तिम वस कीधा अजण तणै॥
पुनि सूर भोज दूदो ऊपनियो, जिम जस धरमतणा जगि जोड़।
सोहिया सिरि राख सुरताणां, किया विरद पाणं बळि कोड़॥
ऊतम गिरि राउ सूर जां ओपिति, को घटि त्रिनैन केही केड़।
जुड़णि पछाड़ हसति जोड़ाळा, सोहां आप आप साखेड़॥
बेऊ अणभंग सदाता बेऊं, बे बेऊं गजमार।
कारणि धर बे कहर कड़खिया, उड़िया रीठ धार अंगार॥
ऊकटिया काट थाट बंटिया असि, रटिया सुयण कहै सिछ रीति।
कटियां सिर ऊपटिया कामंध जूटी खळखटिया अगजीत॥
बंधव अगजोत महाबळ बेऊं, कहर कड़खिया सेन कटै।
धर राजवट सरीखा धणियप, घटै न दूदो भोज घटै॥
खळखटिया सीह दीह को खागै, पार न लाभै किण्ही परि।
करन भोज जोपै दिनि दिनि करि, हाथि दियो सिरि तिलक हरि॥
दूजणसल थकै धणी धर दजूो, अेकणि खत्रि न हुवै कइ अेक।
लेख करम असिमर तप लाधो, अभंग भोज विध राज अनेक॥
ऊतरिया धड़ धारां ओहाजां, वरिसाळा खाळा रतवाह।
पळ पंखाळां गाळां पूरै, प्राम्यो भोजराज परिजाह॥
दळ बादळ गया फाटि खळ दोपझि, कळ कळ सकळ कमळ किरणाळ।
वाखांणै भूअ वळ चंहुवै वळ, राउ तपियो धर छळ रखपाळ॥
परमार हेक तपियो धारापति, काइ भोज तपियो कुळभांण।
तीजै तखति न तपियो तीजो, चहु वरगां खरिखो चहुवांण॥
अकबर पतसाह महण जळ आरिख, अनि पह तप बोळिया अनीति।
माहै थको भोज मांटीपण, राउ रहियो वड़वानळ रीति॥
दुड़ियां अरि तिमर निसाचरि दह दिसि, सद ब्रिद सुरबिया।
हाडां तणां पहाड़ हरखिया, कुळ गरबै उछाह कीया॥
अदभुज जरा छज स्वेदज इंडिज, आश्रम चारि वरण आधार।
जांण अचरचर थावर जंगम, उदियो रतन महा अवतार॥
पित-मात गुरू जग पूजा कर, सेवग साधारण सत सूर।
सनमुख सत्रां परामुख पर-त्री, हाथां मोज हजार हजूर॥
वेदां म्रजाद राखियै वीत्रवह, पूजा ब्रह्म सयळ प्रतिपाळ।
करगे धरम पराक्रित कांने, रतन जतन खत्रवट रखपाळ॥
कणदौरे भीखम अरिजण करगे, मुख मे धरम दुजोअण मांण।
दानी करन विकम परदुख मै, वडम भार जिम सेख वखांण॥
देवांपति इंद कुबेर दवे मै, अंस अगनि वजवजियो बार।
ईस क विसन ब्रह्म रा आरिख, आरिख रयण कहौं अवतार॥
चत्र वेद राग षट भाषा चित मैं, गमि नव व्याकरणां दस ग्रंथ।
रीति चतुरदस गुण चैरासी, प्रीति पुरांण अठारह पंथ॥
सासत्र मे चारि अठारह संम्रिति, जोतिस कळा बहतरी जाण।
लखण बत्रीस छत्रीसइ लोहां, चित धारिवां राउ चहुआंण॥
जमि नियम प्रांण प्रतिहार जोग मैं, धारण आसण ध्यांन समाधि।
अंग आठै आरूढ़ आतमा, सुज हेकलै राखिया साधि॥
सातै सम कळा सात आसै सम, घात सात सातै उपघात।
तनम ल सात चरम सातै तन, जांणग रयण भोज रज जात॥
त्रिण्हि दोस सनाइन वासै मधि नै, दस नै संधि अधिक सत दोइ।
अस्थि त्रिसत ब्रहमंड ओपिया, सुरजनहरो जांणगर सोइ॥
निरबांण जोग वैदक नवरस में, राजस सत तामस मै रूप।
कीध अंगि जेता करणी करि, जगि ता राउ सूर हर जूप॥
परि कोक संगीत पारिखा, दया प्रसन्नता तजे दिपै।
उदारता रूप मै अद्भुत, खता तणो नह बोल खपै॥
वनिता मै सस्त्र सुगंध गीत विधि, बहरथ भोजन सुग्रिह तंबोळ।
अंग आठ मै भोग उचितापती, सो चहुआंण भाया समतोल॥
जगि मूळ धात मै जीव जकाइ विधि, अग्रज अनुज मै अरथ अवेव।
भूत भवीस वर्त मान भलाई, भेदग रयण अनंता भेव॥
आचार रयण कर जेम अेकठा, वाणि अरथ घट सांस करि।
सूर तेज तप अगनि अेक सम, सो तरंग जळ अेक सरि॥
खटत्रीस सीस कुळ रयण खत्रीपण, जसमै कमळ अउब गति जेम।
सहस गुणां वाधै अनि सुकरै, कोड़ि गुणां तैं पूजै केम॥
रेणायर तणैं जगत नीरखतां, सुकरे दान त्रिवेणी सार।
रूपो गंग जमुन गज मरे , धार कनक मै सर सै धार॥
बलवंत राउ चहुवांण बिरदपति, आरंजो मंडै तन आप।
अंतर धर-पुड़ महा आछटै, आंणै बाहिरि सेर आप॥
इळ माथै त्रूटि पड़ै जो अंबर, को अनि वीर न धीर करै।
नरबदहरा तणौं जगि निहचै, धीर जीवतो करगि धरै॥
इळ माथै पानुस कै साहै अहि, आचां तणीं अेम जगि आस।
मेर उपाडि़ झाड़ि पल मांही, अळगै धरै रयण अस हास॥
सूरिज ससि करै पुकार रयण सों, ग्रहण अनाथां जेम ग्रहै।
बिजड़ै राउ तणां ऊपर बळि, राहु तणौं डर न क्यों रहै॥
काळं नळ भोज तणौ कांधाळो, मछराळो सूंडाळा मार।
दंताळां सूंडाळां दोमझि, गलांहां ले मंडै गुंजार॥
कुंभाथळ फोड़ै त्रौड़ै कांधां, मोड़ै नीजोड़ै गज मार।
कुण रोड़ै जोड़ै कांधाळौ, बीछोड़ै बिण खूटी बार॥
सुरताणां बिचै अग्राजै सूरति, राजे थह बूंदी गह राज।
छात्र पछाड़ बंस बळ छाजै, सजी बळ खत्रवट सिरताज॥
बनराउ राउ चहुवांण बैरियां, करग छरा जमराउ किरि।
भंजै दाउ घाउ बळ भंजै, सार दुबाहां घाउ सिरि॥
चख ताउ अगनि मुख त्रिसळै चढ़ियै, कूट आब लावै करिमाळ।
सीह अनीह दीह निसि सोधौ, खौधै रयण दुयण खुधियाळ॥
पाधरि पतसाहां हसति पछाड़ै, ताड़ै ध्रासांड़ै पतसाह।
आरंभ चतुरंग सेन उजाड़ै, पाड़ै कुडाळै नह पांह॥
खौंदाळम माही आलम खिलते, गाजते हि लुटते गजगाउ।
सीह रयण थह लीह समहा, पारघ हेक न लोपै पाउ॥
वहते गजराज सुहड़ असि वणते, घुरते नौबति निहसति घाइ।
बळ हथवाह लगै कुण बांधै, जे बधवा उपयै खळ जाइ॥
दिली चीत्रोड़ सरिस तुड़ दुहुंवै, चवै न घाइ दीण चहुआंण।
मंडै सुख छंडै बळ मंडै, खारो विचे रांण खुरसांण॥
खळ मैंगळ मारि हाथळां खोअै, हुल साबळ बलि भंजै हाड।
च्लु अळपळ वळवळ दिसि चाहै, चीरै कुंभाथळ भख चाड॥
चरणाढ़ खेति बूठो रण चाचरि, इंद्र रतनसी सारि अछेह।
मीर सरीफ तणां दळ माथै, तांजण बात न जाअै तेह॥
काळेहणि हसति फौज बादळ करि, सर गोळी छंटा जळ-स्त्रोण।
दूभर वार अभिनमो ददूो, द्रवियो सार पार विणि द्रोण॥
बीजळ मै बीज गरज मै बाजित्र, मंघा तेज नाखत्र मिळियो।
फरि फरि अफरि पछटतै फौजां, गोरी सेन घाइ गलियो॥
त्रूटो सिर कंध असंधा ताई, खिलै कबंध गड़ू थळ खाइ।
अरि घड़बंध ऊपरै ओवड़ि, रिणि जळ सारि बोलियो राइ॥
धारूजळ धार वळकि सिरि धड़ धड़, वळ वळ किरि बादळ में बींज।
ऊजळ छंट रयण ओवड़ियो, भूतळ खळ रहिया रत भीज॥
कुंभाथळ गड़ा दड़ा जिम कीजै, हाड घड़ा कुटकड़ा हुवा।
रिण में छड़ाछड़ासी रूके, जाइ तड़ाम जुवा॥
बेहड़ा धड़ा बंध त्रेहड़ बेसै, रत्त दड़ा त्रिजड़ा मै रीठ।
सकति गड़गड़ा अपड़ा साहै, पलचरड़ा मरड़ा जुध पीठ॥
अरीयण घड़ा घड़ाबंध ऊपरी, रूक घड़ाबंध बूठौ राउ।
गळिया पुड़ा फौज में गोरी, सेन अणी जळ लाधो साउ॥
वाछंट औझटां कटळ घट बढ़िया, दुजड़ै ऊळट पळट दुवो।
मेह रयण घाइ झड़वट मंडियो, हेवै काळ सुकाळ हुवो॥
रड़वड़िया रुडं मुंड राइजादा, धड़ बे-रुडं गुड़ीया धार।
माणिक डंड प्रचंडां माथै, मेह रयण बूठो झड़ मार॥
सलिता संग्राम सुतट दोइ सेना, गति जळ रुहिर लहर गजगाह।
कर पै मीन चिहुर मै काझी, वहै धार अदभुत मै वाह॥
पळ पंक फेण धज उसणी पड़िया, कूरम तुरस टोप सिर कोडि़।
बड़फर धनख आवरण बणिया, जरद पड़ै ओहाळां जोड़ि॥
मकरा में धड़ा हंस हंसा में, बग में ग्रीध मोर मह साद।
पळचर रातळ दादुर पंखी, साथ अनेक भयानक साद॥
मातंग कमळ सिर नान्हा मोटा, पड़िया कणमाळा पंस।
आहंनी केजम अरबिंदां, बणिया तरण खत्री में वंस॥
पणिहारी सकति माळी उमापती, करिवा कमळमाळ चै कास।
नव गति अछर हूर तिणि नदि चै, वरण मरण जळ तट मै वास॥
नीपनौ सुजस खळ खळै नामिया, गहिया त्रिजड़ झाड़ि गजगाहि।
पळ रत सुघन पामिया पळचर, वधियो सहस खरी हथवाहि॥
मिटियो खुरसांण दखिण सौं मंडियै, बुरां भलां नीसरै वमेक।
हाडां तणीं वाग जुध होवत, हिंदू तुरक न पूगै हेक॥
आरति हेक इंद्र आपणां आरति, असुर सुरां देखतां अनेक।
अंबर दळां रयण जिम आयो, अजण निवात कवच में अेक॥
गज ग्राह सुभट अंबट वै गिळतां, सुणै पुकार गरुड़ तजि साथ।
ऊवेळिवा आपणां आरति, दौड़्यो रयण देव जगनाथ॥
खुरसांण दखिण सुरतांण खळखतै, पड़िया दीठ वजर पाहार।
राउ राउतां मुहर रूकहथ, मिळियौ रूक मिळंती मार॥
जहंगीर सुछळ दखिणाध जुड़ंतां, रिणि पेखियो जिये रहिया।
आंहचि रतन हेक आपड़ियो, केवी लाख रतन कहिया॥
दखिणाध घड़ा माथै दोपहरी, रूके वाळण जूथ रिम।
राउ चहुंआंण रतन रणि अंगणि, तपियो ग्रीषम सूर तिम॥
सिरि अंबर दळां रतन सांभळतो, साकुर आफळीया सिताब।
जिम दरियाउ कहर भेळा जळ, गिरिया मालु मीये गुराब॥
आपाणां चाड पारकां आंगमि, धार मार ऊगार धरि।
खळ वां रयण वाहरु खिजियो, कांसा ऊपरि बीज किरि॥
मैदानां सरिस रतन मुणिसांगुर, असपति हुकम सांमिध्रम आंणि।
फेरियो मअीवाह फेरंतै, चढि़ खीचियां धरा चहुआंणि॥
मारे जुधि सूरजि सांमुहि चढि़या, कर चाढ़ै अनि लोक किया।
राजा राउ रतनि मंुह रूकां, राइ गहण करि रेहळिया॥
कुण गिणै अेक दोइ च्यारि कहै कवि, ऊगै सूरिज अेक मणां।
जीवीजणां दिहाड़ा जेता, तिता प्रवाड़ा रतन तणां॥
मंगळ मेर रतन सहू अनिकामां, जग विधि विधि मंडै जेताहि।
अेकणि जुध दुयणां अमंगळ मैं, पहि जिम पुण्य नखित्रां मांहि॥
आचार रयण ले कर तै ओपै, वंस जेता हिंदु वरण।
हेकांणवै राउ हाथाळां, किरि भासा मिळि व्याकरण॥
मातंग तुरंग रकम नैं मोती, समपे करि सांसण सिरताज।
लिखमी सुकवि सरसती लागो, आंणै रतनि भेटियो आज॥
अइयो जग रतन सूरहर ओपम, धन आसती करग दन धार।
जीरण वैरि सुकवि परजळतां, दे राखिया बड़ा दातार॥
पितलिखमी तणों महा दुखि पीड़वि, दीन्हो उरि बड़वानळ दाह।
ईहग घरां हूंत उपराठी, तिणि जाणो भारती तणाह॥
धखपंख कळूं में हुओ अधीरज, भ्रमियौ वचने त्रिहुं भुवणि।
सरणै पनग राखियो सौभरि, राखियो स सरणै रयणि॥
पूरब मै पछिम दखिण औतर दिसि, प्रिथी पयाळ गयण मै पूज।
दाणव देव नाग जक्ष किंनर, स लहैं कीरति रयण सऊज॥
जंबू मे पलिखी सालद्र जेतै, पुहकर कोंच सु साक परै।
दीप सपत दधि सातां दीपै, कीरति रयण सलोक करै॥
कामरु कामता गोड़ बंगाळी, त्रिहीत रीसणि रयण तवै।
मघ मरहट करणा माळवी, निति कीरीति ऊछाह नवै॥
मेवाड़ गूंड वागड़ मलियारी, गूजर सोरट्ठी गाअंति।
मारू सिंध सागरां मांहै, भलो भलो गुणि रयण भणंति॥
पंचेनद चंद भारगव प्रभणै, चित्र सु वनखंडां में चाहि।
अंगी बंग तिलंगी आखै, कीरति रयण सइध च काहि॥
जाळंधर बोज बालिका जांणै, कासमीर बैरागर कीति।
गंधारी कई कई ति गाळै, पुणै कंबोज सिंघळी प्रीति॥
अेराक समरकंद काबिल आगै, सम सीत बरे जी सलहंति।
केजमी कांसां मंगळ करि करी, वात रयणि कीरति वाचंति॥
चहुंआंण तणा पुरसातन चींतवि, धरिया राग छत्रीस धुणि।
महळ महळ गोखां में मंडित, गावैं राजकुमारि गुणि॥
गीत में वेलि कवित्त में गाहा, छाजै विरद बांधिये छंद।
दूहे नीसांणिये सुदाता, आखीजिये रतन सो इंद॥
कुंडळिये दोढ़ै कहो महा-कवि, सेलारे साउजड़े संधि।
चंद्राइण ला खड़िये चहुंदिसि, विरद रयण रूपक में बंधि॥
गूढ़ारथ जोड़ि त्रांटको गावै, रसाउलो व्याकरण रसि।
राउ रतन रूपक चैरासी, कवि वाखांणै बड़ै कसि॥
जळ सलिता जोव बहै जास्मै जिम, माहे अनि सो मरण मगि।
जग साधार घणां जुग जीवो, जीवै कीरति राउ जगि॥
पुहपां मै अरथ सुजस फळ नेपति, ऊगि मुख कवि तणीं असीस।
सुरतर रयण जगत सिरि सोहै, सोहै वेलि फळी ते सीस॥
अणपार रयण विह पार न आवै, वांचै कवि मतिसारि वळै।
जाणै जिमि धर कीई जाऔ, ते वसिवो असमांण तळै॥
कवित्त
किण्हि इतो कत्तिये, तीर रयणायर फेरे।
अंबर घट चीत्रिये, किण्हि दुहु करगि चितेरे॥
को भुइ पूरी करै, तणी रघुनाथ प्रवाड़ा।
कृप नीर रेळियै, कोटि गुण चास मुहाड़ा॥
चहुंवाण वंस वड़मे रचित, मोटिम वामण री मवै।
कवि कमण रसणि अेकणि कहै, राऊ रतन्न वरन्नवै॥
॥इति॥