बादर शा घेर्या दुरग, कछु अक दिनड़ां माँय।
करुणा सखियां संग लै, जौहर लगी समाय॥
‘धाय’ ‘धाय’ जळगी अगन, अरध रात रे माँय।
सूर उगै ज्यूँ आसमा, गयो उजाळो थाय॥
बादर मझ मेवाड़ सूँ, बामण ल्यो हो साथ।
तेड़्यो पूछ्यो ‘नरहरी’, नागरिया किहि बात॥
किण प्रकाश गढ़ में हुओ, अंधियारे किहि बात।
कहो भला इण देश किम, सूर उग्यौ अधरात?
नरहरि बोल्यो ‘शाहजी, नह अचरज री बात।
अधरम अंधियारो हुवां, सूर उगे इत रात॥
जग मग जळसी सूर ओ, ओ न बुझे लो हाय।
आ चिनगारी शाहजी, मेली पन्ना धाय॥
ज्वाळमुखी मुख ढंकिया, आग न रिया उबाळ।
मेवाड़ी सन्नारियां, मिटी न जौहर जाळ॥
शाह न समझो राण नै पकड़ मारियां जीत।
राणो पन्ना ले गई, होई बात अतीत॥
सावक ले नै सीहणी, निकल पड़ै वन ज्यांह।
आ तिय विक्रम उदय ले, चाल पड़ी पथ त्यांह॥
पन्ना अगनी शाहजी, जो न कणी री मीत।
सुळग्यां सब कुछ बाळिया, ही इण बुझवण रीत॥
आ औरत नह शाह जी, ओ देवी रो रूप।
राणी मानेती सखी, दे इज्जत खुद भूप॥
जाण्यो मान्यो तात इण, मायड़ धर भगतांह।
जिण खींची निज खाग अर, सींची धर रंगतांह॥
सांगा, राखण पीव इण, दउ हाथां कर जंग।
जबर खानवा जुद्ध में, निज सिर खादी खंग॥
बाप मुओ तो जुद्ध में, पीव मुओ तो जंग।
पन्ना दूर हुँ दमकणी, वा खुद लागे खंग॥
जग्यो अनोखो आत्मबळ, पिउ रै रण मरिमांह।
वा खुद धार कटार सी, मन साळै अरियांह॥
इण साहस री मूरती, मेवाड़ां मानीह।
देश भगतिरी भळक आ, त्यागी बलिदानीह॥
आ बिजळी असमान री, आ अगनी विकराळ।
इण चित्तोड़ी दुरग में, ज्वाळमुखी री जाळ॥
इण में खुद काळी बसै, इण में बसै महेश।
जीवतड़ां इण शाह जी, कुण जीते इण देश॥
जो जीत्या भी दुरग नै, दो दिन करसो राज।
जद तक जीवित शाह आ, सिर पड़सी फिर गाज॥
आ जिद्दी पाछे पड़्यां, जो चावै सो होय।
इण नागण काट्या पछे, जळ नह मांगे कोय॥
आ नारी आहत हुआ, करसी देश पुकार।
ले ले शस्तर दौड़सी, व्रध बाळक नर नार॥
फिर चल पड़सी सूरमा, इण मिरतू री राह।
ऐ पन्ना रा देसड़ा, इण कुण जीते शाह॥
उण दिन परलै होवसी, अरि भगसी घर दौड़।
राज हुसी फिर राणरो, आ रहसी चित्तौड़॥
राते जळसी राणियां, कल मरसी सिरदार।
मर खूट्यां में ही अठै, गिणै जीत रा सार॥
ओ नह निकळे चांद शा, ओ न उगे कउ सूर।
आजादी री आग आ, गढ़ लागी भरपूर॥
सहस वरस व्या शाहजी, रुकी न आंरी राड़।
आ आ हारी मौत पण, नह हारी मेवाड़॥
प्रात हुवंतां देखजो, लीधां खाग अभूत।
जग में जीता जागता, मनख मारण्या भूत॥
सुण आ सब हैरान व्यो, मन में शा गुजरात।
हुकम दियो होवण सजग, होण पहल परभात॥
धू धू करती आग री, आसमान गी जाळ।
इत बादरपण शाह रो, उतर गियो पाताळ॥
दुरग खुल्यो चित्तौड़ रो, सुरग खुल्यो ज्यूँ जाण।
भड़ बाघो ले सैन बळ, निकळ पड़्यो खग ताण॥
दउ हाथां वाई खगां, ताज छतर ले शीश।
मालिक ज्यूँ मेवाड़ रो, ओ प्रताप गढ़ धीश॥
खाग डसै ज्यूँ नाग खुद, बाघ भिड़्यो ज्यूँ बाघ।
जीवण सूँ ज्यूँ दुशमणी, मौत हुओ अनुराग॥
अगिण अगिण आरिदळ भिड़्या, मेवाड़ा गढ़ खोल।
जय जय करता मात भूं, द्यो जीवण अनमोल॥
जीत दुरग कछु दिन पछै, बादर ग्यो गुजरात।
पन्ना भड़ ललकारिया, फिर देवण नू मात॥
‘इम किम रहिया रावतां, सुख-हींदा पै हींद।
भुगते न्रप परदेश अर, थां सूता भर नींद॥
यूँ कई ठाकुर राव सब अवसर आयां नेक।
शाके सिर द् या बाप अर, थां रहिया मुख देख॥
नर नाहर मेवाड़ रा, सोचो सोचण हार।
थ्यां खग सूती म्यान में, जागै म्हांर कटार॥
इम किम सूती सींहणी, हे मेवाड़ी नार।
मौत वरणिया सींह हित, सैजां बांह पसार॥
कठै ज’ थारो रौद्रपण, कठै ज’ वा हुँक्कार।
ज्वाळ जळी जे राणियां, रही थनै धिक्कार॥
सुमर सुमर हे सींहणी, किम बैठी मुख मोड़।
जीवित थूँ अगनी जळी, नह छोड्यो चित्तौड़’॥
घर घर धर मेवाड़ में, पूगो ओ संदेश।
आजादी री धधकती, आग लगी सह देश॥
जिण जिण संदेशो सुण्यो, लाग्यो जियां दहाड़।
बूंदी गरजी सीहंणी, कांप उठ्यो मेवाड़॥
कर हमलो चित्तौड़ फिर, जीत गिया सिरदार।
फिर गूंजी इत राण अर, पन्ना री जयकार॥
आया मूंछ मरोड़ता, राणे घालण घात।
पन्ना पाछा फेरिया, वे बादर गुजरात॥
पण दुरगम अर विकट पथ, अजहुँ न खूट्यो धाय।
विक्रम रियो अजोगपण, उदय बाळपण हाय॥
करुणा भी ही आपळी, विक्रम करण सुधार।
लड़ हारी नह कछु हुवो, सुरगां गई सिधार॥
दासी सुत बनबरियो, न्रप नै दुरबळ जाण।
मन ही मन चावण लगो, खुद होवण महराण॥
एक एक कर छोड़ सब, जावण लागा वीर।
राण बणण मन ध्रढ़ हुवो, दासी सुत ‘बनवीर’॥