कायर पण इलजाम सुण, म्रत पति अर परिवार।

धाय चुनौती, काळजे, घुसगी जियां कटार॥

कद आवै वा शुभ घड़ी, कद व्है वो तैवार।

जूंझ पड़ां निज देशनूं, जय जय व्है परिवार॥

बात फळै ज्यूँ मन चही, तगदीरां रै फेर।

उणी रात धर हित मरण, परख हुई बिण देर॥

कहतां बादळ बाळ री भेस बदळ री, गाथ।

पदमण थळ बै पालकी, जूझ मरण री बात॥

तिहि बेळां बारी प्रकटि, कह्यो हांपतो आय।

‘बलबीरे राणा हत्यो, गजब हुई मां धाय॥

पहरे ऊभो दास जो, मांगू रो खुद बाप।

डरसूँ निज तरवार तज, भाग गियो घर आप॥

अब वो निसते चावसी, मारण उदय कुमार।

करणो व्है झटपट करो, देर करण नहिं सार’॥

हाक-बाक पन्ना हुई, सूंग गियो ज्यूँ सांप।

जीवण खतरै उदय सुण, गियो कळेजो कांप॥

बीजे ही खिण जागियो, उण में होश हवास।

इक बिजळी सी चमकगी, उण रे मन-आकास॥

‘झट पट’ बारी नै कह्यो, ‘कुंवर टोपले मैल।

दूना पातळ ढांक, जा, नद बेड़च तट बैठ॥

खबर दार इण बात री, भनक पड़ै नह कोय।

म्हूँ नह आऊं जद तलक, बैठ बाटड़ी जोय’॥

सुण कठोर अति कुँवर आ, धाय माय ध्रढ़ बात।

वारी संग व्यो चालतो, घोर अंधेरी रात॥

माँगू रो पितु खाग तज, भाग गियो सुण ‘वाह’।

चंदन कहि ‘म्हूँ जीतियो, पूरण व्ही मम चाह॥

मनै कुँवर पोशाक दै, अबै सजा दे काय।

बादळ अज्जा बाघ ज्यूँ, आज भिड़ूँ म्हूँ माय॥

पन्ना झट पोशाक ले, कुँवर बणायो वेश।

पण कहियो ‘हे पूत थूँ, अब लड़ै लो लेश॥

लड़ता तब पहिचाणियां, उदय ढूंढसी फेर।

अर मार्‌यां ही मान सी, गढ़ ले सी उण हेर॥

थूँ सू जा मुख ओढनै, सजी कुँवर री सैज।

सोन कड़ा पद हाथ रख, बार चमकता तेज॥

सूव सिराणै चमकमी, मेल कुँवर री पाग।

सोन म्यान री भळकती, खूंटी लटका खाग’॥

माँ पोढ़ायो पूतनै, कियां साज सिणगार।

अर सू गी वा पास धर, बंद कियां निज द्वार॥

‘कह जै भूरी माय माँ, कह जै मांगू ‘सूर’।

वगत पड़्यां ही जांच व्है, किणरै मुख पै नूर॥

नाना, दादा, बाप, सब, मो मरिया रण खेत।

वारी म्हारी माय अब, राण बचावण हेत॥

नमक हरामी रे जियां, छोड भगां नह राण।

देश हितां मिरतू वरां, करां निछावर प्राण॥

कहजै ‘मांगू’ मायड़ी, वचन निभ्या अर आण।

बीदा अज्जा बाघ ज्यूँ, राण हितां द्‌यां प्रांण॥

ज्यूँ ज्यूँ घड़ियाँ मौत री, आवण लगी नजीक।

त्यूँ त्यूँ मन निरमळ हुवो, भाव जग्या बहु नीक॥

मिट मिट ग्या सब आमनां, लोप हुओ सह कोप।

मिरतू वेळां मिनख रै, मन विकार व्है लोप॥

‘हे मायड़ कहजै कुँवर, म्हां भुगत्यो जो भाग।

थारै सिर महराण री, अमर रहे पाग॥

वळै वड़ाई व्है कसी, अजूँ कस्यो व्है नाज।

म्हाँ अरथी पै बैठ नै, थ्यां गादी दी आज॥

शिशु पण भी सिसक्यो नहीं, दूध मायरो देत।

अब किहि हिचकां कुंवरजी, रगत बहावण हेत॥

हे मायड़ कहजै कुंवर, सौ सौ बरसां जीव।

उणरी ऊमरियां प्रभू जुड़ जावै मो जीव॥

कहजै मायड़ कुँवर नै, तरवण तव बहु चाह।

बड़ बूढ़ो सँग लेय ही, जाय सरोवर राह॥

अण सुणिया अब तक किया, म्हाँ मायड़ मधु बैण।

थ्यां सुणजो अर समझजौ, रह जो मायड़ कैण॥

म्हूँ आगे नित रैवतो, जंगळ जांण, सिकार।

सांप चिता शूकर घणा, सँग रख लो सिरदार॥

म्हूँ चढ़ चढ़ नै लावतो, रोक तोय तळ थाम।

थ्यां नह चढ़वण देवतो, ऊंची डाळी आम॥

बोदी डाळी ऊमरा, ऊंचा पेड़ खजूर।

कुँवर कधी चढ़ जै मती, कहजै कणी मजूर॥

धूणी धनुष चालावतां, सब कुछ आगे पेख।

तीर निशाणै छोड़जो, मनख तनख भल देख॥

छोरा चिलमटिया कऊ, कदियन करजै संग।

कछु अक दारू वापरै, कछु अक पीवै भंग॥

कहजै कूड़ा बावड़ी, मत जाजै कहुँ दूर।

नद नाळै जळ बैवतां, सांप तिरै भर पूर॥

एड़ो दिन किणनै मिलै, पावन बळै अबोट।

मरवण बेळा भी कुळक, चंदनिया रे होट॥

अब रियो उर आमनों, अब रियो उद्वेग।

देश हितां अब मरणरा, मिट मिट ग्या आवेग॥

सोना रूपा रो दिवस, मिल्यो मरण शुभ काज।

म्हाँ सिर देतां कुँवर जी, राण हुआ थाँ आज॥

म्हारै किहि चावै अबै, थूँ गादी महराण।

म्हारै तगदीरां भली, अरथी समसाण॥

थ्यां गादी बैठाय नै, सुखद हिंदोळै हीन्द।

हे मायड़ कहजै कुँवर, म्हां सूता भर नींद॥

ना कोऊ री कामना, ना कोऊ अरमान।

ज्यूँ आया त्यूँ चालिया, धरती रा मिजमान॥

जीवै उतरौ ही मनख, जतरी व्है बस जूण।

होळी जळै ऐकली, साथ जळै भल कूण॥

कहजै चौपड़ खेल भी, सार मरै दो चार।

खेल कदी रुकियो रै, खेलणियाँ हुशियार॥

हाय कबड्डी खेल ज्यूँ, सब कछु लेवै झैल।

मरियां, मरियो माननै, बचियो खेले खेल॥

हे मायड़ विश्वास नै, कह दीजै वात।

दीवाळी रा दीवळा, जळे सारी रात॥

इण मेवाड़ी नै प्रभु, भाग भलौ थैं दीध।

बिण रण जूंझ्‌या सैजपै, वाज्या हाय शहीद!॥

देश हितां लड़ मरणरा, मो मिल्या गळ हार।

उतरी म्हारी आरती, सपना रे संसार॥

जुद्ध खानवा जावतां, तिलक कियो पितु माय।

अर खग दीधी हाथ में, चरणां सीस नमाय॥

गुड़ दे मुख मीठो कियो, गळ सुमनां दे माळ।

झिल मिल की कह आरती, ‘रहजो भू रखवाळ’॥

हाय शहीदी मुख हितां, गुड़ लावै कुण रात।

फीकै मूँडै ही मुओ, तव धायी भ्रात॥

कहजै माई कुंवर नै, हो लड़वण तैयार।

माँ रै कहियां ही रुक्यो, तज दीधी तरवार॥

लड़ मरवण में मानतो, म्हूँ मेवाड़ां मान।

कहजै जूँझण रा जबर, उर रहिया अरमान॥

कह जै म्हूँ डरपूँ नहीं, मौत मिलूं गळ लाय।

बाप डरप्यो जिण कदी, पूत डरै की हाय॥

जुद्ध करंता मरणरो, मो मिल्यो सुख हाय।

थ्यां राखण अरिखाग मुख, गळ मांडण मो भाय॥

कहजै मायड़ सौगनां, म्हां कियो प्रतिरोध।

मरण हुकम जननी भलां, किहि लावां अवरोध॥

जनम दियो जिण माय जग, द्यो बचपण अनुराग।

उण री आज्ञा सूँ मरण, है कितरां रे भाग॥

घण घण वे अरमान हा, देश हितां मन मेय।

सिर देवण रण बाप ज्यूँ, सौ सौ अरि सिर लेय॥

हे मायड़ यूँ नेह सूँ, मम माथौ मत छूव।

मन म्हारो काचो पड़ै, नैणा लागे चूव’॥

स्रोत
  • पोथी : पन्नाधाय ,
  • सिरजक : रामसिंह सोलंकी ,
  • संपादक : ठा. स्वरूप सिंह चूंडावत, डॉ. औंकारसिंह राठौड़ ,
  • प्रकाशक : चिराग प्रकाशन, उदयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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